बुधवार, 11 अप्रैल 2012

जागीर.





अरे छोटी सी बात पर,


इज्जत दांव पर लगाओगे.

कल को जब,

बच्चे भूखे मरेंगे,

तो क्या बेचोगे?

उनके लिए रोटी,

कहाँ से लाओगे?

इक्कीसवीं शदी का भारत.





शहर का भीड़ भरा इलाका,

बम का एक जोरदार धमाका.

टूटी हुई इमारत ,

बगल में लिखा था-

इक्कीसवीं शदी का भारत.

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

गज़ल.





नए शहर की नई गली में एक नया अध्याय मिला.

एक नई मजबूरी देखी,जीने का पर्याय मिला.

यहाँ अमीरी और गरीबी,सिक्के के दो पहलू हैं,

इस गहरी खाई को भरने,हर अमला असहाय मिला.

चेहरे पर चेहरा रखने की,कितनी बड़ी अहमियत है,

वर्षों से गुमनाम रहा जो,वो कल करता हाय मिला.

बुझ जायेगी आग उदर की,कुछ ऐसी उम्मीद जगी,
,
आज उन्हीं उम्मीदों का यूँ,जलता हुआ सराय मिला.

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

शहर मेरा वीराना क्यूँ है.





उम्मीदों की चिता सजी है.
अरमा झरते आँखों से.
धधक रहा है अंतर्मन यह,
सुलगी सुलगी सांसों से.
टूट रहे हैं रिश्ते नाते,
टूट रहे हैं वादे भी.
कठिन कसौटी पर चढते ही,
टूटे नेक इरादे भी.
प्यार और ममता जैसे ये,
सारे शब्द पराये हैं.
अपनों से ही दूर हो रहे,
अब अपने ही साये हैं.

हर चेहरा अपना लगता है,
पर मुझसे अनजाना क्यूँ है?
शहर मेरा वीराना क्यूँ है?

रौद्र बड़ा है सूरज जाने,
कब जलता आकाश बुझे.
प्यासा अगर समंदर हो तो,
जाने कैसे प्यास बुझे.
कुछ दिन से यह भीड़ बड़ी है,
जाने क्यूँ श्मशानों में.
लाशों की खेती दिखती,
हर खेत और खलिहानो में.

कातिल दिल है तो फिर उसका,
प्यार भरा अफ़साना क्यूँ है?
शहर मेरा वीराना क्यूँ है?

कैसा देश और कैसी सरहद,
बेच रहे चौराहों पर.
संविधान भी मौन खड़ा है,
इनके किये गुनाहों पर.
कुछ चेहरों को देख डर रहे,
कुछ चेहरे बेचारे देखो.
कुछ के आगे नतमस्तक हैं,
देखो चेहरे सारे देखो.

मेरी ही बंदूकों से यूँ,
मुझ पर सधा निशाना क्यूँ है?
शहर मेरा वीराना क्यूँ है?

कुर्शी के दीवाने लगते ,
आस-पास के गाँव यहाँ.
ऐसी कानाफूसी मानो,
कल हो कोई चुनाव यहाँ.
वचनबद्ध है कोई चेहरा,
कुछ चेहरों के आगे.
कोई है तैयार खडा
कब,प्रजातंत्र ले भागे.

इनकी संसद सत्ता तो फिर,
सब का आना जाना क्यूँ है?
शहर मेरा वीराना क्यूँ है?

दरिया जैसी आँखें लेकिन,
पानी की एक बूँद नहीं.
रोते हुए हैसियत कहती,
उसका कोई वजूद नहीं.
घुट-घुट कर मरते हैं चहेरे,
घर की चारदीवारी में.
चौखट पर ईमान बिका,
यह झलक रहा लाचारी में.

नई शदी का नया दौर यह,
लगता मगर पुराना क्यूँ है?
शहर मेरा वीराना क्यूँ है?

इस हम्माम में सब नंगे फिर,
यह नाटक यह ड्रामा कैसा?
काले दिल का धन काला तो,
फिर उस पर हंगामा कैसा?
जो चेहरा हमको दिखता वह,
केवल एक मुखौटा है.
असली चेहरा,बेच वतन को,
कल विदेश से लौटा है.

बस्ती का बच्चा-बच्चा फिर,
सिस्टम का दीवाना क्यूँ है?
शहर मेरा वीराना क्यूँ है? 





गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

भ्रम


संसद में रोटी का मुद्दा,फिर शायद गरमायेगा.

यह बजट तो इस कलंक को,अब की बार मिटाएगा.

कंकड,पत्थर रख हांडी में,माँ फिर उसे पकायेगी,

फिर से उसका भूखा बेटा,भ्रम खाकर सो जाएगा.




जय सिंह"गगन"

तुम्हारी बस्ती में.





गज़ल 

भूखी,नंगी बेबस सी, आवाम, तुम्हारी बस्ती में.

पूछ रहे हो कैसे गुज़री, शाम, तुम्हारी बस्ती में.

पीट रहे हो खूब ढिढोरा, मैंने किया विकास बहुत,

हर बीमारी करती है, आराम, तुम्हारी बस्ती में.

टपक रहे हैं घर के छप्पर, अंधियारे का डेरा है,

ऐसी बदबू, जीना लगे, हराम, तुम्हारी बस्ती में.

सूखा स्तन मुंह में दे कर, बच्चे को बहलाने की,

सारी कोशिश माँ की है, नाकाम, तुम्हारी बस्ती में.

बेगारी ने हुनर को जोड़ा, अपराधों के दामन से,

हर काले धंधे चलते, अविराम, तुम्हारी बस्ती में.


पथराई आँखों से सपना, केवल तुमने छीना है.

होने को बस”गगन”हुआ, बदनाम, तुम्हारी बस्ती में.

                         जय सिंह”गगन”

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

चाहत.




यहाँ अँधेरा बड़ा घना है,कब तक सर टकरायेंगे.

शब्द हमारे तनहां हैं यूँ,आखिर कब तक गायेंगे.

इस धरती से उस अम्बर तक,छाई बस वीरानी है,

तुम होंठों से छूलो इक-इक,हर्फ़ गज़ल बन जायेंगें.

जय सिंह"गगन"