सोमवार, 2 नवंबर 2020

नइकी दुलहिया

 


 

 

 

रचनाकार के कलम से-

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जी हुकुम दुइ डाँड़ी

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बघेलखंड मध्य भारत केर बहुतै परसिद्ध अउर ऐतिहासिक क्षेत्र आइ। इआ मध्य प्रदेश राज्य के उत्तर-पूर्वी भाग म स्थित हिबै जउने म मध्य प्रदेश केर कइउ जिला सम्मिलित हमा।ज

 

बघेली या बाघेली, हिंदिनि जइसन एक भासा आइ जउन भारत के बघेलखण्ड क्षेत्र म बोली जाति हिबै। इआ मध्य प्रदेश के रीवा, सतना, सीधी, उमरिया, अउर शहडोल,अनूपपुर म उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद अउर मिर्जापुर जिला म एके अलावा छत्तीसगढ़ के बिलासपुर अउर कोरिया जनपदन म बोली जाति हिबै। इआ बोली क "बघेलखण्डी", "रिमही" अउर "रिवई" के नाउ से जाना जात हिबै।

 

हमरउ पैदाइसि सौभागि से बघेलखंड क आइ एह से  बघेलखण्ड म पइदा होइ के नाते अपना पंचे बघेली से हमरेउ लगाउ क बहुतै निकहा ढंग से समझि सकित हिबै। घरे म भाई बहिनिनि म सबसे छोट होइ के नाते सबै केर भरपूर स्नेह अउर दुलार मिला।ओइसे त सबै भाई बहिनिनि केर साहित्य म खासी पकड़ हिबै पइ बड़े भाई साहब अवध प्रताप सिंह "शेष" जी केर कविता अउर बड़ी बहिन श्रीमती कंचन सिंह जी केर कहानी संग्रह "फूलो से दोस्ती मेरी" अउर "सिसकती शहादत" पढ़ि कइ 1989 से सुरू भये अपने लेखन क माजै म बहुत सहायता मिली।बघेली लेखन केर सुरुआत त 1990 से होइ ग रही पइ एका गहिराई देइ क सगला श्रेय आदरणीय सिरी सुधकांत मिश्र "बेलाला" अउर सिरी रामसुख मिश्र "सफाया" जी के शानदार लेखन क जात हिबै जउने म चारि चाँद लगाबय केर काम "सोंधी माटी,लोनी बघेली" के पटल पुरोधा परम श्रद्धेय सिरी श्री निवास शुक्ल "सरस" जी के साथ पटल से जुड़े सबै आदरणीयन के द्वारा कीन ग जउन आजु निता तक जारी हिबै। बघेली के लोक साहित्य क पढ़ि कइ अउर ओके मिठास म बूड़ि कइ अपना पंचेन के समक्ष आपन इआ बघेली रचना संग्रह "नइकी दुलहिया" रक्खइ केर हिम्मति जुटाइत लाहै।

 

बघेलखंड म बघेली केर एक से एक रचनाकार हमां जे लगातार कइउ बरिसि से बघेली भासा अउर बघेली के प्रचार प्रसार म आपन जिन्नगी होमे हमां।ओहीं हवनकुंड म हमरे एह रचना संग्रह क थोर क आहुति समझि कइ अपना पंचेन से आसिरवाद केरि अपेक्षा हिबै तउने इआ कलम समुंद म एक बूंदिनि सही पइ आपन जथा जोग योगदान देइ के निता हमेसा मजबूत बनी रहै।

 

हम इआ बहुतै निकहे से जानित हिबै के बघेली भासा म हमार हाँथ बहुतै सकिल हिबै एह से बहुत गलतीउ भई होइहीं पइ एह भासा क सीखै पढ़ै अउर समझै केर हमार प्रयास अजुअउ निरंतर जारी हिबै।


 

हम बघेली भासा के मामले म गरीब भले होइ पइ अपने रचना संग्रह "नइकी दुलहिया" रूपी एह टाठी म कविता, गीत, ग़ज़ल,मुक्तक लगभग सबै तरह के व्यंजन परसि कइ अपना पंचेन के महिमानी म कउनउ कोर कसरि अपनी जानि नहीं छोड़ेंन हिबै। एह से इआ गरिबही महिमानी क स्वीकार करी अउर आपन आसिरवाद देई तउने पुनि कइ अपना पंचेन केरि महिमानी करै केरि हिम्मति जुटाइ सकी।

 

भासा अउर बिचार क पूंजी,

बांधे रहेन तइ गांठी म।

इआ "नइकी दुलहिया" परसिसि,

सब अपना के टाठी म।

आखर आखर हमां एकट्ठा,

चाहै भले गरीब हमां।

पइ समाज क अइना लीन्हे,

देखी बहुत करीब हमां।

गीत, ग़ज़ल, कविता अउ मुक्तक,

सब अपना के बानी म।

रिकमजि अउर इंदरहरि साही,

लगे हमां महिमानी म।

लेइ पढ़ी उसासी देई,

गलती होइ सुधार करी।

सादर हबै समर्पित सब क,

हिरदय से सुइकार करी।

 

सादर परनाम, जय राम जी, साहब सलाम

 

जय सिंह "गगन"

ग्राम - अर्जुनपुर, हनुमना,

जिला - रीवा (म.प्र.)

।।जय माँ सरस्वती ।।

 

कविता का शाब्दिक अर्थ है काव्यात्मक रचना या कवि की कृति, जो छन्दों की श्रृंखलाओं  में विधिवत बाँधी जाती है। काव्य वह वाक्य रचना है जिससे चित्त किसी रस या मनोवेग से पूर्ण हो अर्थात् वह जिसमें चुने हुए शब्दों के द्वारा कल्पना और मनोवेगों का प्रभाव डाला जाता है।

प्रस्तुत रचना संग्रह "नइकी दुलहिया" में भी  मैनें प्राय: यही देखा कि लेखक कवि ने  मन की अवस्थाओं का चित्रण अधिक किया है। कविता व्यक्ति निष्ठ हो या समष्टि( समूह) निष्ठ हो सर्वत्र  भावनाओं को ही चित्रित किया गया है । कहीं उच्छृंखल मन की उड़ान, कहीं  आशा, कहीं निराशा, कहीं उपेक्षा सभी  प्रकार की मानसिक अवस्थाओं का चित्रण इस कविता संग्रह में देखने को मिलता है। नइकी दुलहिया शब्द संकेत करता है कि कवि अनेक सामाजिक न्यूनताओं के प्रति चिन्तित है।  इनके कविता संग्रह में हम हारि गयेन हम हारि गयेन, हुकुम होई त बोली साहब, बहुत बढ़ी मँहगाई साहब, गाँधी बाबा आइ जई, आदि कविताएँ जनमानस के तत्कालीन स्वरूप को प्रकट करती हैं जिससे कवि अपने मनोभावों को इसी रूप में प्रकट करता है ।

 

मैं कविश्रेष्ठ  श्री जय सिंह गगन को साधुवाद देता हूँ कि जिन्होने विभिन्न कार्यक्रमों में व्यस्त रहते हुए भी काव्य रचनाओं के प्रति अपनी निष्ठा को जीवित रखकर रचनाओं के क्रम को गति देते रहे। फलस्वरूप कविता संग्रह नइकी दुलहिया नामक ग्रंथ के रूप में प्रकाशित हो रहा है ।

 

मैं कोई महान् साहित्यकार अथवा समीक्षक नही हूँ फिर भी मेरे मतानुसार श्री जय सिंह गगन द्वारा रचित "नइकी दुलहिया" की समस्त रचनाएँ साहित्य की कसौटी पर खरी उतरेंगी ऐसा मेरा विश्वास है । क्योंकि वे यति, गति, और हास्य  रस से परिपूर्ण है, उनमें मौलिकता का समावेश है । वास्तव में इन रचनाओं में एक अलौकिक मिठास है, दर्द का एहसास है, सत्य का निवास है और साहित्य का लिबास है। बाबा अड़गड़ नाथ से प्रार्थना करता हूँ की इनकी कल्पना के साथ-साथ इनकी लेखनी भी सदैव गतिमान रहे ।

 

रामसुख मिश्र 'सफाया'

शिक्षक, हास्य व्यंग्य कवि (बघेली),

ग्राम-पोस्ट अँजोरा,

तहसील- त्योंथर,

रीवा, मध्यप्रदेश

दूरभाष-9893975471

मैया केरि साधना

 

नउरात्री म करइ साधना,

सीधे चढ़ेंन पहारे।

काँपत काँपत शैलपुत्री क,

पूजेंन बइठि दुआरे।

 

हे महतारी खोली आँखी,

हमरेउ कइति निहारी।

ब्रह्मचारिणी करी कृपा अब,

हमहूँ काहीं तारी।

 

तिसरे दिना चंद्रघंटा क,

घिउ क दिया जलाएन हइ।

हवन स्तुती कीन्हेंन सगली,

भजन आरती गायेंन हइ।

 

चउथे दिन कुष्मांडा पूजइ,

पहुचेन ओनखे धामा।

बल बुद्धि अउ आयु बढ़इ,

पइ रोगउ दोख भगामा।

 

मूरति धरेंन दुआरे हमहूँ,

लीन्हेंन सब से चंदा।

पचमें सुक्ख सांती चाही,

हे माता स्कन्दा।

 

हे कात्यायनी छठवां दिन,

अब तोहरे हबै हवाले।

रोग बिआधि न आबै पाबै,

कउनउ बइठे ठाले।

 

सतमे दिन हे कालरात्री"

दुष्टन क संहार करा।

हमरेउ तन क मोक्ष देबाबा,

कइसउ बेड़ा पार करा।

 

हे गौरी हम आठ दिना से,

तोहका रहेंन निहारे।

कउनउ देइ सिद्धि जइ अब,

हमहूँ घरे दुआरे।

 

 

 

 

अंसुअन धारि फोरि नहबायेन,

नउ दिन अब उद्धार करा।

जउन बना त किहेन साधना,

सिद्धिदात्री पार करा।

 

किहेन साधना कैसौ साधेंन,

हे महतारी तोहंका।

धन ऐष्वर्य सौभाग्य जाइ न,

एका कइसउ रोका।

 

सब कुछु छोड़ि छाड़ि कइ माता,

तोहरे सरन म आएंन तइ।

एहं साँसन क जोरि कइ कइसउ,

चरनन ध्यान लगाएंन तइ।

 

हे महतारी, हे नउ दुर्गा,

हिम वासिनि सब ज्ञाता सुनि ले।

हे कुष्मांडा कालरात्रि हे,

गौरी दुर्गा माता सुनि ले।

 

विधि विधान हम कुछु न जानी,

बस नउ दिन नहबायेन तोहका।

ब्रह्मचारिणी महतारी अस,

चरनन सीस नबायेन तोहका।

 

रक्षा राइ लरिका बच्चा,

तोहरे अंचरे डारे हन।

धूप दीप नैवेद्य लिहे हम,

सउहैं खड़े दुआरे हन।

 

जतना पाप पुन्नि कीन्हेंन हइ,

गुन अवगुन सब जमा करब।

गलती होई लरिका मानि कइ,

माता सब दिन क्षमा करब।

 

जय माता दी
कविता

हम हारि गयेन हम हारि गयेन

 

हम हारि गयेन हम हारि गयेन,हम एह जनता से हारि गयेन.

हम हारि गयेन हम हारि गयेन,हम एह जनता से हारि गयेन.

 

नदी,तलाये,पहरी म,एंह सगळे जरत दूपहरी म,

हम भले उबेने धायेन तइ,पइ एनकर काम करायेन तइ.

हम लडि कइ सगळे अफ़सर से,योजना लइ आयेन दफ़्तर से,

ई घरे क पइसा पाइ गएँ,पइ सचइ ओका खाइ गएँ.

 

अतनेउ म करिनि शिकायत जब,हम सउहइ चकरी मारि गएन.

हम हारि गयेन हम हारि गयेन,हम एह जनता से हारि गयेन.

 

ई लरिकउ भये म खाइनि हइ,जब मरे हइ तबहूँ पाइनि हइ,

ई चारिउ कइति ते हूरत हाँ,अतनेउ म देखि कइ घूरत हाँ,

सब चाउर गोहूँ पाइ रहें,घर बइठी मज़े से खाइ रहें,

जउनउ पामा सब फूकत हाँ,हमका देखत हँ थूकत हाँ,

 

एनके खातिर हम गदहउ के,सीधे वरमाला डारि गयेन.

हम हारि गयेन हम हारि गयेन,हम एह जनता से हारि गयेन.

 

अब कही का एनके बारे म,हइ खोदा पंप दूआरे म,

उ चकर चकर नेरिआइ रहा,हइ पानी तबउ पिआइ रहा.

सगला ओन्ना लत्ता पाइनि,पिन्सिन पाइनि भत्ता पाइनि,

पइ तबहूँ सगळे धाबत हाँ,ई देखत हाँ गरिआबत हाँ.

 

हम जस लूटइ के चक्कर मा,का कही के धारिनि-धारि गयेन.

हम हारि गयेन हम हारि गयेन,हम एह जनता से हारि गयेन.

 

झउअन पईसा के लेखा मा,पइ हमा ग़रीबी रेखा मा,

अउरउ पाबइ क धाइ परें,जो नहीं मिला तउआइ परें.

एनकर हम गारी सहि डारेन,इमली क आमा कहि डारेन,

हर साझि सकारे दिन दूपहर,ई चढ़े हाँ सउहइ छाती पर.

 

हम सगला नखरा सहत गयेन,पइ बिपदा एनकर टारि गयेन.

हम हारि गयेन हम हारि गयेन,हम एह जनता से हारि गयेन.

 

सुख-दुख म धायेन घरे-घरे,हम सड़क बनायेन घरे-घरे,

खेती-बारी हइ सबइ सधी,सब भवन बनायेन बान्धि बधी,

पानी-पानी नेरिआत रहें,हर साल खरीदा खात रहें,

पइ तबहूँ गोटी खेले हाँ,नटई म सांग हुलेले हाँ,

 

हम"गगन" के हाथे लूँड़ा दइ,खुद अपनेन घर क जारि गयेन.

हम हारि गयेन हम हारि गयेन,हम एह जनता से हारि गयेन.


 

कविता.

हाइ रे जनपद.

 

हाइ रे जनपद हाइ रे जनपद,पइसइ पइसा खाइ रे जनपद.

हरियर हरियर नोट देख़ाबा,देखइ त बिदुराइ रे जनपद.

 

जाइ के सगली आफ़िस देखा,अइसन कहँउ न पउबे.

कउनउ काम कराबइ खातिर,खीस निपोरे धउबे.

फ़ाइल टाँग पसारे सोइहीं एंह खिरकी ओंह अरबा म.

बाबू पुछबे कहाँ हमा त पता चली के मोरबा म.

 

पूजत-पूजत एंह देउतन क उमर चली अधिआइ रे जनपद.

हाइ रे जनपद हाइ रे जनपद,पइसइ पइसा खाइ रे जनपद.

 

एकौ नहीं फ़ायदा दादू एनसे सीना जोरी मा.

चढ़ी साइकिल सीधे फ़ाइल पहुँची जाइ तिजोरी मा.

अइसन रही पटउहें माही जस कजही मेहरारू.

पूछइ जाबे कहिहीं तोहसे चला पियाबा दारू.

 

बिना तपउना सुनइ न एकउ बस बिगड़इ रिसिआइ रे जनपद.

हाइ रे जनपद हाइ रे जनपद,पइसइ पइसा खाइ रे जनपद.

 

करजा के मंज़ूरी खातिर एनके लगे तूँ जाबे.

फारम भरतइ बिना कर्ज़ के कर्ज़दार बनि जाबे.

सउहँइ सउहँ कहित हइ देखा दोष हमार न दीन्हें.

घोष देइ क पइसा होई तबइ कर्ज़ तूँ लीन्हें.

 

चारि हज़ार के करजा खातिर चालीस देइ लगाइ रे जनपद.

हाइ रे जनपद हाइ रे जनपद,पइसइ पइसा खाइ रे जनपद.

 

साँझि सकारे करबे पूजा पाछे पाछे धउबे.

गाइ भइंसि क भरबे फारम तब बोकरी तूँ पउबे.

ओहूँ माही कहिहीं तोहसे हुशियारी ना छाटा.

तोहइनि भर क मिला हइ करजा सीधे मुरगा काटा.

 

देखत देखत छीनइ भरे म फ़ाइल जाइ हेराइ रे जनपद.

हाइ रे जनपद हाइ रे जनपद,पइसइ पइसा खाइ रे जनपद.

 

चाहइ बरहउ होइ घरे म चाहइ होइ सतइसा.

जच्चा बच्चा दूंनहूँ पइहीं एंह जनपद से पइसा.

सोंठी सोठउरा के पइसा क ताके हाँ मेहरारू.

मुरगा अंडा छानि रहें इ छलकि रहा हइ दारू.

 

मेटरनिटी क परिखे परिखे दुलही गयीं बुढाइ रे जनपद.

हाइ रे जनपद हाइ रे जनपद,पइसइ पइसा खाइ रे जनपद.

 

आगनबाड़ी केर नियुक्ति सबसे बड़ा हइ मुद्दा.

जउने खातिर गाँउ- गाँउ म मचा हइ गारी-फुद्दा.

गहना गुरिया मोल लेइ क छिटके हाँ व्यापारी.

देबे-ळेबे तबइ बनइहीं दुलही क अधिकारी.

 

बिन नेउछाबरि कबउ न होई कतनउ कहइ बताइ रे जनपद.

हाइ रे जनपद हाइ रे जनपद,पइसइ पइसा खाइ रे जनपद.

 

शिक्षा कर्मी बनइ के खातिर मची हइ मारामारी.

लइकइ फारम घूमि रही हाँ लरिकन कइ महतारी.

रमुआ देहे हइ पइसा बलभर लात तानि कइ सोई.

बिन रूपिया के आबा-जा तूँ कबउ चयन न होइ.

 

गहना गुरिया खेत बेचाने भिक्षा दिहिसि मगाइ रे जनपद.

हाइ रे जनपद हाइ रे जनपद,पइसइ पइसा खाइ रे जनपद.

 

जे.जी.एस. म मिली न हेरे लकड़ी केर बुरादा.

गामउ केर भिखारी पामा मूलभूत से जादा.

बांकी पइसा घूमि रहा हइ दिल्ली अउ भोपाल म.

उलझे हाँ सरपंच इहन सब कागज के जंजाल म.

 

दुनिया भर क तबउ रिकभरी सीधे देइ चढ़ाइ रे जनपद.

हाइ रे जनपद हाइ रे जनपद,पइसइ पइसा खाइ रे जनपद.

 

हम तउ कहिथे खींचा खांचा कहँउ दुक्ख न रोबा.

ग्राम-सभा क धरा मुड़उसे लात तानि कइ सोबा.

मीटिंग सीटिंग मारा गोली अन्च पंच क छोड़ा.

दउडि रहा हइ काल्हिउ दउड़ी ई कागज क घोड़ा.

 

बचइ-खुचइ क एंह दुनिया म कतनिउ हमा उपाइ रे जनपद.

हाइ रे जनपद हाइ रे जनपद,पइसइ पइसा खाइ रे जनपद.

 

साल तमाम म खाता माही दस पचास जो आबा.

पास करबइ जाबे कहिहीं आधा पइसा लाबा.

चर्चा एकर कहउँ न कीन्हे बुद्धिमान जो बनबे.

रगड़ी देब मूल्याकन माही खीस निपोरे बगबे.

 

का मतलब हइ एनसे चाहइ जनता मरइ-हेराइ रे जनपद.

हाइ रे जनपद हाइ रे जनपद,पइसइ पइसा खाइ रे जनपद.

 

हम सब क बरबाद करइ म सगला हमा उतारू.

दबा पान बिदूराइ रहें जस कोठा कइ मेहरारू.

जनता अइसन चुनिसि जउन के सुख-दुख ओनकर बाँटइ.

अइसन नहीं के मुहइ देखाबत लागइ छाती फाटइ.

 

 

घोंस अकोर म नटई पाबइ सीधे देइ दबाइ रे जनपद.

हाइ रे जनपद हाइ रे जनपद,पइसइ पइसा खाइ रे जनपद.

 

चला चली अब घरे-दुआरे कइले मोट करेजा.

अब कउनउ आदेश मिलइ त चपरासी क भेजा.

नहीं त अउबे-जाबे होई दस-पचास क खर्चा.

कउनउ काम करइ क कहबे एनका लागी मरचा.

 

"गगन"छोडि दे चरचा एकर आपन जरइ-बुताइ रे जनपद.

हाइ रे जनपद हाइ रे जनपद,पइसइ पइसा खाइ रे जनपद.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

कविता.

लरिका खिचरी खइहीं.

 

झूर-झार अब मिली न देखा पका-पकाबा पइहीं.

आसउँ से स्कूली माही लरिका खिचरी खइहीं.

 

कइकइ कुल्ला बड़े सकन्‍ने बइठे पढ़इ दुआरे.

खिचरी-खिचरी रटत हँ सगला दिन दुपहर भिनसारे.

नबइ बजे से चारिउ कइती झोरा लइ मेंड़राइ परें.

खोरिया डारिनि बस्ता मा अउ स्कूली क धाइ परें.

 

थोपिहीं सगले गोड़े-हांथे मुहु सगला लभरइहीं.

आसउँ से स्कूली माही लरिका खिचरी खइहीं.

 

पहिले रहा त लरिकन काहीं अतना रहा सरेख़ा.

पढ़बे-लिखबे तबहिनि दादू खाइ क पउबे देखा.

अब देखा त लइकइ छूही पिढ़ई बस्ता रंगा.

पूछे- पांछे बनइ न एकउ का खा गा घा अंगा.

 

महतारी जो पढ़इ कहइ त इ खिसिआइ के धइहीं.

आसउँ से स्कूली माही लरिका खिचरी खइहीं.

 

कच्चा चाउर चाबि-चाबि कइ पेट रोज पिरबइहीं.

सगली राति न सोबइ देइहीं लइकइ लोटा धइहीं.

करजा सगळे मूडे होइ ग गोली अउर दबाई मा.

लूँड़ा लागइ स्कूली के खिचरी केर खबाई मा.

 

फइली सगले गाँउ कालरा अतनइ बिढ़ता लइहीं.

आसउँ से स्कूली माही लरिका खिचरी खइहीं.

 

सरपंचन का होइगइ चाँदी एनके खाइ-खबाबइ मा.

छोडि पढाई मास्टर लगिगें सब खिचरी परसाबइ मा.

केहू केर गिलासि फूटि गइ फूटि ग लोटा टाठी.

पहुँचे घरे त महतारी लइ धायी जरत लुआठी.

 

बाबू ज इ हीं पंडित जी क दस अक्षर गरिअइहीं.

आसउँ से स्कूली माही लरिका खिचरी खइहीं.

 

इ "मध्यान भोजन"लइ बूड़ा स्कूलन कइ शिक्षा.

आजु खबाई खिचरी सब फेरि मागाई भिक्षा.

राजनीति अब घुसि गइ सगळे घरे गाउ चउफेरे.

एँह खिचरी के नाते देखा रोज़ी मिली न हेरे.

 

राह चलत मनइनि क लुटिहीं कउनउ घरे सकइहीं.

आसउँ से स्कूली माही लरिका खिचरी खइहीं.

 

पढ़ा-लिखा भिखिआरी होइहीं अनपढ़ बनिहीं राजा.

एँह खिचरी के चलते देखा बजी देश क बाजा.

करा शिकाईति कहँउ जाइ कइ तूँ भोपाल औ दिल्ली.

एनके आगे सब लागत हँ जइसइ भीगी बिल्ली.

 

खईहीं पइसा"गगन" छानि कइ दाबि पान बिदूरइहीं.

आसउँ से स्कूली माही लरिका खिचरी खइहीं.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

                                                       

 

 

 

 

 

 


कविता.

साक्षरता अभियान.

 

अब अनाथ कस लरिका घूमा आजु के हिन्दुस्तान मा.

दिदी अउ बाबू पढ़इ चलेंगे साक्षरता अभियान मा.

 

बड़कउना लइ बस्ता धाबा कलुआ लइ कइ पाटी.

हर-बर्दा सब ढीलि पियारे पहुँचे चुपरे माटी.

छीँदा परा बगार चरि लिहिनि रामदीन कइ गइया.

चर्बाहन क लइकइ ओरहन पहुँचे समझू भइया.

 

कक्षा लागइ शुख़ीराम के तरकारी दूकान मा.

दिदी अउ बाबू पढ़इ चलेंगे साक्षरता अभियान मा.

 

पका खेत काटइ बिन परि ग सरि गें बाँध-बन्धोली.

बड़ी घोड़ अस बछिया मरि गइ बिन सूजी बिन गोली.

गोरू-रकरा मरत हाँ घर मा बिन चारा बिन पानी.

चउथेपन मा गीता बांची गाँउ क अहिरिनि कानी.

 

आख़िर कउन फ़ायदा हइ एँह '' से "कमला" ग्यान मा.

दिदी अउ बाबू पढ़इ चलेंगे साक्षरता अभियान मा.

 

नये-नये लरिकउने सगला सिगरेट बीड़ी धूका.

अउर बुढ़उने खाइ कइ सुरती चारिउ कइती थूका.

आधा समय बितामा ओहीं सगला पढ़इ-पढाबइ मा.

आधा साँझि-सकारे सगळे लरिकन का गरिआबइ मा.

 

'' से "रोटी" कहाँ मिलइ अब '' से बने "मकान" मा.

दिदी अउ बाबू पढ़इ चलेंगे साक्षरता अभियान मा.

 

लरिका सब बरबाद होइ गएँ '' से "फल" अउ "फरसा" मा.

आजु पतोहिया पढ़इ चली गइ गउना केर मदरसा मा.

बाहर देत हाँ लेक्चर घर मा अँगरेजी मा गारी.

डलहौजी का मेम बनी हइ रमुआ कइ महतारी.

 

नशा चढा हइ गांजा साही बुडबा अउर ज़बान मा.

दिदी अउ बाबू पढ़इ चलेंगे साक्षरता अभियान मा.

 

सगला गाँउ एकट्ठा होइकइ मारइ गप्प-सड़ाका.

चाहइ भले घरे मा घुसि कइ चोरबे मारा डाका.

मोहना केर पतोह छुइ दिहिसि शुकुलाईनि क पानी.

शुकुल पड़े त एक कइ दिहिनि दाई,बिटिया,नानी.

 

मास्टर जी का मूड़ फूटि गा "सब जन एक समान" मा.

दिदी अउ बाबू पढ़इ चलेंगे साक्षरता अभियान मा.

 

सरकारी कागज मा होइ ग साक्षर गाँउ बरउँठा.

सब नर-नारी पढ़े-लिखे हँ तबउ लगामा अउँठा.

इ साक्षरता कुच्छू नही बस पईसा कइ बरबादी.

रोज पढ़ा परिवार नियोजन तबउ बढ़इ आबादी.

 

अरबन रूपिया खाइनि नेता एहीं जन-कल्याण मा.

दिदी अउ बाबू पढ़इ चलेंगे साक्षरता अभियान मा.

 

काहे पईसा खर्च करति हइ एँह सब म बेकार का.

ईया जाइ समझाबा केऊ एँह भारत सरकार का.

पहिले जतना पढ़े-लिखे हाँ ओनकर जनम बनाबा.

ओके बाद मा बाकी सब का क,खा,,घा सिखबाबा.

 

जागी देश "गगन" जब शिक्षा पहुँची घरे मकान मा.

दिदी अउ बाबू पढ़इ चलेंगे साक्षरता अभियान मा.

 

 


 

 

कविता.

कलयुग बड़ा प्रबल हइ प्रभु जी.

 

भक्त हमा भक्तइ कस देखा ओनका कष्ट न दीन्हे.

कलयुग बड़ा प्रबल हइ प्रभु जी कबउ जनम न लीन्हे.

 

चारि साल से भईसिउ देखा एकउ नहीं बियानी.

माखन मिसिरी दूध मलाई मिला होइ त जानी.

मोल दूध के पइसा खातिर रोज़िगारी हाँ घेरे.

तरछी भर छाछ नाचइ क कहउ मिली न हेरे.

 

दहिउ समझि कइ रितई दोहनी फोरि-फारि न दीन्हे.

कलयुग बड़ा प्रबल हइ प्रभु जी कबउ जनम न लीन्हे.

 

रास रचउबे गारी देइहीं बिटिअन कइ महतारी.

पुलिस पकडि थाने पहुँचाई बीसन गोदा मारी.

कहँउ जमानतदार न मिलिहीं कउनउ जुगुति के लागे.

बड़ी पतनि बसुदेव क होई एह समाज के आगे.

 

काज-बिआह क केउ न पूछी अइसन करम न कीन्हे.

कलयुग बड़ा प्रबल हइ प्रभु जी कबउ जनम न लीन्हे.

 

चीरहरण क जमुना तट पर तूँ रहि जाबे गेरे.

पछिउहीं संस्कृति म देहें ओन्ना मिली न हेरे.

आपन भेष बदलि ले देखा करा न तूँ मनमानी.

लदर-फदर म घास न डलिहीं कउनउ राधा रानी.

 

बनी ठनी गोपिनि क देखिकइ तूँ पछीआइ न लीन्हे.

कलयुग बड़ा प्रबल हइ प्रभु जी कबउ जनम न लीन्हे.

 

इहन कालिया बिलि मा घुसि कइ पउआ अद्धी छानी.

जमुना जी मा मिली न हेरे कहँउ बूँद भर पानी.

चरनोई के भूमि मा बटि गा अतना बड़ा गोबरधन.

मेघन के बरसे मा धारण का करबे यदुनन्दन.

 

पटवारिनि का काहे आपन ब्रह्म लेखनी दीन्हे.

कलयुग बड़ा प्रबल हइ प्रभु जी कबउ जनम न लीन्हे.

 

दादा बनिकइ कहउ जो देखा कन्श क नटई दाबे.

हत्या केर मुक़दमा लागी चउदह साल क जाबे.

महिलन के आयोग क नेता हबइ पूतना माई.

बक्क-बाइ जो ओसे करबे सीधे जेल देखाई.

 

गोरि-नारि वरदी धारिनि से छेड़-छाड़ न कीन्हे.

कलयुग बड़ा प्रबल हइ प्रभु जी कबउ जनम न लीन्हे.

 

गारी-फुद्दा देबइ करिहीं केउ न तरबा चाटी.

चक्र शुदर्शन शिशुपाल क कतनी नटई काटी.

अवैध शस्त्र क बनी मुक़दमा बड़ा पचेड़ा अँटकी.

टाडा लागी अउ तिहाड़ म लइनि जाइ कइ पटकी.

 

घर-दूआर जसुमति मईआ क राजसात न कीन्हे.

कलयुग बड़ा प्रबल हइ प्रभु जी कबउ जनम न लीन्हे.

 

ओसामा कस कतना घूमत हँ बारह नंबर टांगे.

अर्जुन क गांडीव धइजई एटम बम के आगे.

अब पंचर बनबाबइ खातिर कर्ण न परिखी देखा.

काटि-छाटि फुरसति कइदेई सगली जीवन रेखा.

 

दगी मिसाईल जीत-हार का कबउ न दाबा कीन्हे.

कलयुग बड़ा प्रबल हइ प्रभु जी कबउ जनम न लीन्हे.

 

बमवर्षक विमान लइ छाती इहन पितामह चडिहीं.

दुर्योधन शकुनी पांडव क राति-विराति कइ तडिहीं.

हाइड्रोजन बम से इ धरती बीचइ-बीच म फाटी.

उमर बनी अश्वत्थामा औ सीधे नटई काटी.

 

कालयवन बनि बुश बइठा हइ आपन प्राण न दीन्हे.

कलयुग बड़ा प्रबल हइ प्रभु जी कबउ जनम न लीन्हे.

 

एँह से पहिले एंह सृष्टि क प्रभु विनाश कइ देते.

ओके बाद अकेले छुट्टा इहन जनम तूँ लेते.

माखन मिशिरी दूध मलाई फटे हाल सब खाते.

रास रचउते गोपिनि के संग दबा पान बिदूराते.

 

जब लीन्हे अवतार जगत म "गगनउ" क तूँ चीन्हे.

कलयुग बड़ा प्रबल हइ प्रभु जी कबउ जनम न लीन्हे.

 

 


कविता.

लूड़ा लागइ एह सरपन्ची.

 

नेम-प्रेम त आधइ रहि ग मूड कपार न फुटइ.

लूड़ा लागइ एह सरपन्ची खानदान न टूटइ.

 

साँझि-सकारे मूडे माही धरे हाथ हम रोई.

चारि साल से कबउ पेट भर सोबइ मिला न होई.

सकल गाँउ भिंसारे एँही आबइ करइ मुखारी.

सोटइ चाइ अउ चाबइ हर दिन आधा किलो सुपारी.

 

कबउ न होइ के चीनी गुर क करजा ससुरा छूटइ.

लूड़ा लागइ एह सरपन्ची खानदान न टूटइ.

 

कहँउ घिये क मेटिया ढरकी फूटा कहँउ कठउता.

सगली राति बइठी कइ घर म होइ रोज समझउता.

रोटी मूदे चूल्हा माही सोइ गयीं मेहरारू.

सगला गांउ जुहाइ ओसरिआ छानि रहा हइ दारू.

 

एहीं भामा-भोरे कउनउ घर-दुआर न लूटइ.

लूड़ा लागइ एह सरपन्ची खानदान न टूटइ.

 

पापा के बगली सोबइ क लरिका हबइ निहारे.

बाप क पिंडा पारत पापा बइठे हमां दुआरे.

रोबइ बपुरा बिन पापा के आबइ न अउँघाई.

जरतइ जरत लुआठी बपुरा पाबइ रोज बिदाई.

 

मारे डेरि के भितरेन सुसुकइ अउ खटिया म मूतइ.

आगी लागइ एह सरपन्ची खानदान न टूटइ.

 

हमहूँ एंह सरपन्ची माही खूबइ नाउ कमानेन.

रहा खरीदब दूरि बाप क भुइयाँ बेचइ जानेन.

दउडि-धूपि कइ कहँउ से कबहूँ आधा तीहा लाएन.

खाइ-पदाइ एइ सब लीन्हीनि बदनामी भर पायेन.

 

सगला हाथ लुआठी होइ ग होम-गरास क छूतइ.

लूड़ा लागइ एह सरपन्ची खानदान न टूटइ.

 

पाँच साल म लगी न हाथे एकउ हियाँ अधेला.

एंह जन-सेवा के चक्कर म मगिहीं भीखि गदेला.

जनता लेई नाउ जबइ तक पिअइ-खाइ क पाई.

काटी अँगुरी मूतइ कह्बे गली चलत गरिआई.

 

"गगन" गाँउ क कुकुरौ लगिहीं सब तोहंका यमदूतइ.

लूड़ा लागइ एह सरपन्ची खानदान न टूटइ.

 

                                    कविता

                  परधानी.

हारि गएँ जिमीदार,राजा औ रानी.

रमुआ कई मेहरारू जीति गइ प्रधानी.

 

खूब बँटा दारू औ कटा रोज भईसा.

घरे-घरे बरसा तइ झमाझम पईसा.

चला नही दाउँ-पेंच आँचा अउ पांचा.

मतदाता मारि दिहिनि मुहे माँ तमाचा.

 

फँसा जउन बपुरा त उहई मज़ा जानी.

रमुआ कई मेहरारू जीति गइ प्रधानी.

 

गाउँ के एहँ चुनाउ माँ भइ बिपत्ति भारी.

टोरि दिहिनि खानदान नेउता अउ सुपारी.

जे जहाँ मानिनि तइ जउन बोट आपन.

ओनकर त होइग चुनाउ म समापन.

 

रामदीन छोडि दीहिनि गाउँ क जजमानी.

रमुआ कई मेहरारू जीति गइ प्रधानी.

 

ई चुनाउ एहँ समय सबसे बड़ा मुद्दा.

घरे-घरे मचा हबइ गारी अउ फुद्दा.

आपन सरकारि आई अपने दुआरे.

अपसइ म लड़ा रहाँ पनही उतारे.

 

मरत हमाँ महतारी-बाप बिना पानी.

रमुआ कई मेहरारू जीति गइ प्रधानी.

 

पहिले जब मिलाँ कबउ कइतिआइ भागाँ.

आजु गिरा गोड़े अउ परनामी दागाँ.

पनिअउ अछूत कहाँ कबउ होइ नेउता.

ओनहिनि क पूजि रहें मंदिर कस देउता.

 

कलुई चमारिनि भइ दुर्गा महरानी.

रमुआ कई मेहरारू जीति गइ प्रधानी.

 

ओह दारी जब तोहँका जिताइसि तइ जनता.

पाँच साल रोइ कइ बिताईसि तइ जनता.

पढ़े-लिखे कतना हुशिआर रहे काकू.

नहीं करे कुछू तूँ बेकार रहे काकू.

 

खाए हइ चीनी अउ चाउर मनमानी.

रमुआ कई मेहरारू जीति गइ प्रधानी.

 

 

एह डिगरी धारिनि से अउठइ हइ अच्छा.

थोर बहुत जउन करी काम करी सच्चा.

कहउ करइ नागा त सब जन मिलि टोंका.

जउन करइ नीक करइ ग़लत करइ रोका.

 

"गगन" करी जनता अब तोहरउ निगरानी.

रमुआ कई मेहरारू जीति गइ प्रधानी.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

                                                  

 

 


कविता

 

बोर्ड क आबा इम्तहान मोरे दादू क.

अँटका हइ चूंदई म प्रान मोरे दादू क.

 

सुरती सुपारी ससू जान बना ओनकर.

ज़ेबा देखा पॅयन क दुकान बना ओनकर.

कतनउ जो कहइ त सुनात नहीं एनके.

पान देखा मुहें म ओंबात नहीं एनके.

 

होठ ओठलाली कस ललान मोरे दादू क.

अँटका हइ चूंदई म प्रान मोरे दादू क.

 

चर्र-चर्र राति भर फारि रहें चुटका.

सगळे खलीशा माँहि डारि रहें चुटका.

घोड़ा हाँथी गदहा क नाम लिखि डारिनि.

पेटे अउ पिठाहें म तमाम लिखि डारिनि.

 

बिना पढ़े होइग बिहान मोरे दादू क.

अँटका हइ चूंदई म प्रान मोरे दादू क.

 

अपनेन कस टोली म डहरि रहें देखा.

जीगर हँ झंडा अस फहरि रहें देखा.

छिनइ भर देखा अउ हेराइ जाँइ पट्टई.

पढ़इ लिखइ कहइ त पराइ जाइ पट्टई.

 

कक्षा माही पउबे तूँ लूकान मोरे दादू क.

अँटका हइ चूंदई म प्रान मोरे दादू क.

 

आसउँ त पढ़ाई म कमाल कइ आएँ.

पर्चा क सगला सवाल कइ आएँ.

उल्टा सीधा सगला घटाइ जोडि आएँ.

परचा म चुटका घलाइ छोडि आएँ.

 

पास नहीं फेल भर सुनान मोरे दादू क.

अँटका हइ चूंदई म प्रान मोरे दादू क.

 

ओइसे क सगला बज़ार छुछुअइहीं.

पढ़इ जो कहै त बेराम होइ जइहीं.

छोटकउना सोइ ग लिबाला क ताके.

महतारी बइठी हइ लाला क ताके.

 

राति-राति पउबे तूँ हेरान मोरे दादू क.

अँटका हइ चूंदई म प्रान मोरे दादू क.

 

 

एनके पढाई माही घरबउ बेचाइ ग.

आसउँ के परीक्षा माही फरमउ भराइ ग.

छोडि कइ पढ़ाई क उदार भएँ दादू.

नकल क आसउँ ठेकेदार भएँ दादू.

 

"गगन" हमां तबउ पछिआन मोरे दादू क.

अँटका हइ चूंदई म प्रान मोरे दादू क.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

                        


कविता

बाबू पंडित जी मारत हँ

 

कसि कइ जई स्कूल, मस्‍टरबे आंखी काडि निहारत हँ.

बाबू पंडित जी मारत हँ, बाबू पंडित जी मारत हँ.

 

चारि महीना बीति ग अजुऔ, कखागघा लिखवावत हँ.

नहीं बनत जब पून्छिथे त, उ खिसियाई के धावत हँ.

चौथा कइ किताब पढ़वैही, अँग्रेज़ी लिखवइहीं.

थोरौक जो ग़लती भइ त, नटई डंडा नईहीं.

 

दिन भर सोबत हँ कुर्सी पर, पान-सुपारी झारत हँ.

बाबू पंडित जी मारत हँ, बाबू पंडित जी मारत हँ.

 

मरिहीं गप्प सड़ाका दिन भर, पांसा दिन भर खेलिहीं.

हमका पचेन क खेलत देखिहीं, लइ कइ छड़ी उकेलिहीं.

दुपहर कइ स्कूल म अईहीं, बाँधे बड़ा मुरइठा.

हम जो लेट भयेन त कहिहीं, कान पकड़ि कइ बइठा.

 

घरे गाउ क गुस्सा सगला, हमरेन उपर उतारत हँ.

बाबू पंडित जी मारत हँ, बाबू पंडित जी मारत हँ.

 

जब से कक्षा म अइहीं त, अँउघईहीं जमुअईहीं.

खोलि कइ डब्बी नगद बूंक् भर, चून औ सुरती खईही.

थून्कि-थून्कि कइ भरे हँ सगळे, भुइयाँ खिड़की भीती म.

प्रेम से धूँकत बीड़ी घुमिही, चारिउ कईति पछीती म.

 

जइसइ कतना थके हों घर म, अइसन टांग पसारत हँ.

बाबू पंडित जी मारत हँ, बाबू पंडित जी मारत हँ.

 

लरिकन से गोबर टरबईहीं, पोतबईहीं झरबईहीं.

खाइ के झउआ भर अईहीं त, डेकरि-डेकरि डेरबईहीं.

सगली राजनीति भारत क, एहीं आइ बतईहीं.

ज़ोर-ज़ोर से हँसिही एहीं, ई खोतड़ पिरबईहीं.

 

हम बोली त लइकइ गोदा, ई आरती उतरात हँ.

बाबू पंडित जी मारत हँ, बाबू पंडित जी मारत हँ.

 

लरिका औ मास्टर अइसन हँ, जइसइ मूस- बिलारी.

ताड़े रहत हँ मौका मिलतइ, पकड़ि कइ कान उखारी.

तूँ अइसने पढाई म अब, पास क आस निहारे न.

नाउ कटाइ ले नहीं त देखा, फेल होब त मारे न.

 

हर चउथे दिन स्कूली म, अर्जी छोडि नदारत हँ.

बाबू पंडित जी मारत हँ, बाबू पंडित जी मारत हँ.

 

कविता

कर्मी बनइ क ठाने लरिका

 

कर्मी बनइ क ठाने लरिका,गली-गली मंडराने लरिका.

कर्मी बनइ क ठाने लरिका,गली-गली मंडराने लरिका.

 

झर-झर बहई पसीना देखा,डटे हँ ताने सीना देखा.

सूची क हँ ताड़े बपुरे झांकिया आँखी गाड़े बपुरे.

ताके बोरी बंडा बाबू,सोंटी रहे हँ ठंडा बाबू.

लागाँ सबै अघोरी जैसन बिचका पहिल कलोरी जैसन.

 

भेड़ी नि साही भरे हँ सगले होटल पान दुकाने लरिका.

कर्मी बनइ क ठाने लरिका,गली-गली मंडराने लरिका.

 

मुहु रोमन केर बनाए सगले,पान हमां लभ्राए सगले.

आपन दीन्हें प्राण हमाँ सब,साहब क पछियान हमां सब.

रूपिया क हँ अयिठे साहब,हमां पटौहें बइठे साहब.

पईसा सगळा धरा हई आगे,रोबत पत्तये परा हई आगे.

 

मेहरि क गहना सब लैकै पहुन्ची गएँ बनियाने लरिका.

कर्मी बनइ क ठाने लरिका,गली-गली मंडराने लरिका.

 

कम एकौ अब गहब ना देखा,साहब से हम कहब ना देखा.

पौआ अद्धी छानिहीं साहब,तबई जाई कई मनिहीं साहब.

नाउ कहौं न कतई इ ताका,अग्रीगेट न घ ट इ इ ताका.

झूठौ जुगुति बताई रहे हँ,सब आपन कास खाई रहे हँ.

 

पूजी रहे बबुअन क बपुरे आपन देउता माने लरिका.

कर्मी बनइ क ठाने लरिका,गली-गली मंडराने लरिका.

 

आपन हित सब साधे घूमा,हर सदस्य पद बाधे घूमा.

जेबा एन्कर भारी होई,दुलही तब अधिकारी होई.

साजु अउर सिंगार देखि कई,टपकै एन्कर लार देखिकै.

सगळा नजरि हँ गाड़े देखा,मिशिर शुकुल औ पांडे देखा.

 

मरजादा सब लूंडा लगी गई बिढ़ता एहै कमाने लरिका.

कर्मी बनइ क ठाने लरिका,गली-गली मंडराने लरिका.

 

 

कमें घटे कुछु बोली साहब,मुहु आपन कुछु खोली साहब.

जर जमीन जोरू सब बिकिगें,घर दुआर गोरू सब बिकिगें.

नोट ता बस एक झाऊ अ इ चाही,उपाध्यक्ष क पौ अ इ चाही.

रिसिआने अध्यक्ष मनाबा.एक बोतल अंगरेजी लाबा.

 

 

भूल-भुलैया बना हई जनपद सगळा हमां हेराने लरिका.

कर्मी बनइ क ठाने लरिका,गली-गली मंडराने लरिका.

 

कहौं चौह अब हिली न देखा.बोट त कैसौ मिली न देखा.

माग इ जाबे लाठी पौबे ,सौहें जरत लुआठी पौबे.

हम तौ सौहें कहिथे सुनिले,साथ माँ तोहरे रहिथे सुनिले.

हम प्रचार माँ जाब न कैसौ,लाठी डंडा खाब न कैसौ.

 

"गगन"फूटि ले तोहुं का हँ सगळा चीन्हें जाने लरिका.

कर्मी बनइ क ठाने लरिका,गली-गली मंडराने लरिका.

 

 

 

 

 

 

 

                                     


कविता

हुकुम होई त बोली साहब.

 

हुकुम होइ त बोली साहब हुकुम होइ त बोली साहब.

मुहु आपन हम खोली साहब हुकुम होइ त बोली साहब.

 

घर म नाउ-बारी खाइनि,अफ़सर औ अधिकारी खाइनि.

नेता खाइनि मंत्री खाइनि,बचा-खुचा उपयंत्री खाइनि.

आयेज कहब त लागी नागा,फाइलि लिखै क बाबू माँगा.

खीस निपोरे सगळे धायेन बदनामी भर हमहूँ खायेन.

 

जेल जाइ क मिला न हियर कहउ केउ हमजोली साहब.

हुकुम होइ त बोली साहब हुकुम होइ त बोली साहब.

 

जिला जाइ कइ विपदा गाउब, सोचे रहेन तइ काम लहाउब.

बाबू सब खिसिआइ के धाये,चपरासी गुर्राइ के धाये.

मर्यादा सब खोइ के बोला,पइसा कौड़ी होइ त बोला.

जानित हइ हुशियार बड़े ह,नहबाबा अस घोड़ खड़े ह.

 

एंह देउतन के कसि कइ लागइ सोची चंदन रोली साहब.

हुकुम होइ त बोली साहब हुकुम होइ त बोली साहब.

 

नोट खाइगें झोरा खाइनि चाउर खाइनि बोरा खाइनि.

बची-खुची सब आस खाइगें भवनन क संडास खाइगें.

सगला हमरे आड़े खाइनि दुवे तिवारी पांडे खाइनि.

बंगला क हरबाही माँगा,साहब क कुछु चाही माँगा.

 

गद्दा कहिनि रज़ाई दीन्हेन तबहूँ माँगा खोली साहब.

हुकुम होइ त बोली साहब हुकुम होइ त बोली साहब.

 

चारिऊ कइति ते हूरइ जनता,देखइ त बस घूरइ जनता.

सोचइ पइसा पाइग देखा,परधनमा सब खाइ ग देखा.

फटा करेजा हमरउ झाँकी,मर्यादा कूछु अपनउ ताकी.

अतना नांगा करा न देखी,छाती मोगरा धरा न देखी.

 

मान अउर मर्यादा माँगी हमहूँ फांदे झोली साहब.

हुकुम होइ त बोली साहब हुकुम होइ त बोली साहब.

 

फाइलि चली निहारी अपना, करी जाँच इन्क्वारी अपना.

पइसा मिला अधूरा देखी तबउ काम हइ पूरा देखी.

फटा हइ सब म खीसइ साहब,काम हइ तबहूँ बीसइ साहब.

जईसन पईसा पाई मनई,ओइसइ काम कराई मनई.

 

चाहइ "गगन" क सूली टागी चाहइ मारी गोली साहब.

हुकुम होइ त बोली साहब हुकुम होइ त बोली साहब.

कविता

गाउँ केर हर लरिका पिअइ म उतारू हइ.

 

दूध बहुत मँहगा भ सस्ती इ दारू हइ.

गाउँ केर हर लरिका पिअइ म उतारू हइ.

 

मुहु खोलइ भाखा म वजन बहुत भारी हइ.

जीभि जो हलाबइ त झर झराति गारी हइ.

लाजि शरम एनकर सब कोठे पर रक्खा हइ

.दाई  महतारी  त  ओठे  पर  रक्खा हइ.

 

आँही बड़मनई पर चाल सब गमारू हइ.

गाउँ केर हर लरिका पिअइ म उतारू हइ.

 

पौआ के आड़े म बोतल भर झोंकत हँ.

राह चलत मनई क गोरू अस ठोकत हँ.

ज़ेबा कस हाथ रोज कुठलिउ म फेरत हँ.

कमे घटे राहिनि क अँधिअरहा घेरत हँ.

 

बची केऊ कसिकइ जब काम जानमारू हइ.

गाउँ केर हर लरिका पिअइ म उतारू हइ.

 

जमी हबइ महफ़िल औ बातचीत जारी हइ.

एक बोतल देशी कइ ज़ेबा म डारी हइ.

लादेन के साथ बइठी चारि पेग मारे हँ.

मंत्री मनीस्टर सब खीसा म डारे हँ.

 

लिहिनि दिहिनि एइ फँसा बपुरा बंगारू हइ.

गाउँ केर हर लरिका पिअइ म उतारू हइ.

 

संध्या सकारे इ चारि पहर बागत हँ.

घरे क परानी सब ताकि-ताकि जागत हँ.

मुनुआ त ताके हइ पापा कब अउबे तूँ.

बस्ता  खोलौबे  पहाड़ा  लिखौबे  तूँ.

 

करम धुनति छिटई अस रोबति मेहरारू हइ.

गाउँ केर हर लरिका पिअइ म उतारू हइ.

 

घरे रहा घरे पिया घरबइ पिआबा तूँ.

मागि जाचि काम करा डाका न नाबा तूँ.

गउना के इज्जति क खोइ-खोइ बारे न.

बाप  महतारी  क  जीतइ  तूँ मारे न.

 

"गगन" क बेटउनउ त सबइ कस उबारू हइ.

गाउँ केर हर लरिका पिअइ म उतारू हइ.

कविता

बहुत बढ़ी महगाई साहब

 

चुनेन जौन सरकार त ससूरी उ निकॅरी हरजाई

बहुत बढ़ी महगाई साहब बहुत बढ़ी महगाई .

 

तेल बिना भई सूनि कराही,कसिकै लागई छौंका.

अतनी महगी गैस न भरई दुलही चूल्हा धौंका.

दारि खाई क तरसी मनई रोज गोलन्हथी सोटी.

लरिकन क महतारी देई बिना नोन क रोटी.

 

छोटकउना हई घिये क भुकुरा कतनी करी पिटाई.

बहुत बढ़ी महगाई साहब बहुत बढ़ी महगाई

 

अस्सी रूपिया खांड बिका भई चीनी पार पचासा.

नब्बे रूपिया गुड भ ससुरा मरिसि शतक बताशा.

अतनी गुस्सा लागई ससूरी उहई दाँत भर पीसी.

चाइ बिना जब नात बिदा भें धै गई सगल रहीशी.

 

बड़ा दुक्ख है तुहिनि बताबा कहाँ-कहाँ हम गाई.

बहुत बढ़ी महगाई साहब बहुत बढ़ी महगाई.

 

छत्तीस इंच क ईया करेजा काल्हि अईठी ग सउहइ.

भाउ सुनत आलू भाटा क दाँत बइठी ग सउहइ.

सरा टमाटर धरे दुकाने बेचति रहइ लुगाई.

दस रूपिया क मागेन ससुरि उहउ रपति कइ धाई.

 

सत्तर रूपिया फूल क गोभी कौने घरे पकाई.

बहुत बढ़ी महगाई साहब बहुत बढ़ी महगाई.

 

घासलेट क पुजइ न मनई बीजुरी हबै निहारे.

कबउ थोर क लप्प-लुप्प भइ कबउ जरी भिंसारे.

कब अईहीं महरानी एनकातुकुर-तुकुर हम ताकी.

बिल भर सगला करम कइ लिहिसि कुर्की भर हइ बांकी.

 

अइसन करै मसखरी जइसइ इहइ होइ भौजाई.

बहुत बढ़ी महगाई साहब बहुत बढ़ी महगाई.

 

खादी खातिर पुजा न पइसा रोज टटोही ज़ेबा.

बहुत महग हइ डीजल ससुरा कसि कइ होइ पलेबा.

कर्ज़ा रहा सोसायटी माँही बढ़ा हबइ हर्जाना.

विधि-विधान से बोएन तबहुँ पका न एकौ दाना.

 

एंह जीवन म कबौ न होई अब एकर भरपाई.

बहुत बढ़ी महगाई साहब बहुत बढ़ी महगाई.

 

पून्छि धरै क बँधी दुआरे सटहटि साही गाइ ससू.

भईसि झुराइ के काँटा होइगइ कसि कइ भला पेन्हाई ससू.

चालिस रूपिया चूनी जौन के परी रहइ चौफेरे.

दूईसौ रूपिया झाल क बूसा,आसउ मिला न हेरे.

 

लरिका तरसाँ माँठा खातिर दोहनी हँ खहराई.

बहुत बढ़ी महगाई साहब बहुत बढ़ी महगाई.

 

लरिकन केरि पढ़ाई खातिर करी रोज हरबाही.

अतनेउ माँही तबौ पुजइ न काँपी क़लम औ स्याही.

तीन साल से स्कूलन कइ सगली फीस हइ बांकी.

आगी लागै रोज-रोज अब केकर डेहरी ताकी.

 

कइसन कइ"स्कूलि चली हम"कसि कई होइ पढ़ाई.

बहुत बढ़ी महगाई साहब बहुत बढ़ी महगाई.

 

कन्या-दान योजना माही बिटिया हमू बियाहेन.

जतना जुरा ज़ुहान त दीन्हेन आपन धरम निबाहेन.

पाईनि जौन त ओका समधी मानि लिहिनि सरकारी.

थान-थार सब लेई क पुनि कई करे हमां तैयारी.

 

एह "लाडली लक्ष्मी" क अब कसि कइ होइ बिदाई.

बहुत बढ़ी महगाई साहब बहुत बढ़ी महगाई.

 

खाइ-पियै क मिलै पेट भर सोई सुक्ख से जागी.

ओन्ना-लत्ता पहिरा लरिका हाथ जोरि कइ मागी.

अइसन नहीं के पानी खातिर खीस निपोरे धाई.

अइसन बनइ योजना जौने नोन-तेल त पाई.

 

"गगन" बनि गएँ मंत्री ओंनका चला इहइ समझाई.

बहुत बढ़ी महगाई साहब बहुत बढ़ी महगाई.

 

                       

 

 

 

 

 

 

                                         


कविता.

बी.एड. त सब पर भारी हइ.

 

हरी भरी कक्षा हइ सुंदर,निकही सजी अँटारी हइ.

बी.एड. त सब पर भारी हइ,बी.एड. त सब पर भारी हइ.

 

सब अपने मर्ज़ी क मालिक,कुछु आइ रहें कुछु जाइ रहें.

कुछु कक्षा माही बईठे हँ,कुछु अगल-बगल लहराइ रहें.

कुछु बड़े सकन्ने से आमा,कुछु जाँ गोधुली बेला मा.

कुछु सटे पछीती बइठे हँ,कुछु खड़े पान के ठेला मा.

 

दिन भर देबिनि के पूजा मा हर लरिका बना भिखारी हइ.

बी.एड. त सब पर भारी हइ,बी.एड. त सब पर भारी हइ.

 

कुछु सल्ट पैंट उज्ज़र-बज्ज़र,कुछु रंग-बिरंगी सारी हँ.

कुछु नवा-नवेला छउना हँ,कुछु नर कुछु सुंदर नारी हँ.

हेड मुरलीधर बृंदावन क,कुछु उधौ अउर सुदामा हँ.

कउनउ हँ पूतना माई कस,कउनउ लोचन अभिरामा हँ.

 

जेठउ म हरिअरी छाई हइ,माहौल अमंगल हारी हइ.

बी.एड. त सब पर भारी हइ,बी.एड. त सब पर भारी हइ.

 

कुछु हमा पधारे कुर्सी पर,कुछु फिल्मी धुन मा गाइ रहें.

कुछु मुरलीधर के डब्बी से,बस काढ़ी कुलींजन खाइ रहें.

मास्टर बाबू सब चाहत हँ,बस रंग जमाई बी. एड. मा.

गुरुदल मा मची खलबली हइ, हम जाइ पढ़ाई बी. एड. मा.

 

कुछुअन के खातिर बी. एड. क ई,कक्षइ प्राण अधारी हइ.

बी.एड. त सब पर भारी हइ,बी.एड. त सब पर भारी हइ.

 

उ पढ़े हँ कउनउ अउर विषय,बी. एड. मा कूछो पढ़ावत हँ.

सूरदास कारी कामरि पर,कउनउ रंग चढ़ावत हँ.

कुछु खाइ टिफिन लरिकहरिनि क,गदहा कस पचके-फूले हँ.

कुछु मुरलीधर के काँधे म,बैताल सरीखे झूले हँ.

 

हइ प्राइवेट नौकरी तबउ, जलवा एनकर सरकारी हइ.

बी.एड. त सब पर भारी हइ,बी.एड. त सब पर भारी हइ.

 

बी. ए. अउर बी.एस.सी.वाले,लरिका हमा निहारे सोचा.

कब सूरज पच्छिउँ म निकरी,प्रभु अइहीं एंह द्वारे सोचा.

कतनउ इहन महीना बीता,कबउ न फ़िरिकइ झाकिनि.

घंटन बी. एड. माही घुसिकइ,सेतिउ-मेति क फाकिनि.

 

जइसइ रघुराई क ताके लंका म जनक दुलारी हइ.

बी.एड. त सब पर भारी हइ,बी.एड. त सब पर भारी हइ.

 

हँ लूंज-पुंज कुछु बॉल सखा,जे मनई देखि कइ भागत हँ.

हँ अइसन जइसइ सूरदास,कब सोबत हँ कब जागत हँ.

बीचइ म शोभित गुरु वशिष्ट,हइ जटा-जूट लहराइ रही.

कोने म सकुड़ी अरुंधती,बस मंद-मंद मुस्काई रही.

 

एंह जनक नंदिनी के आगे,लंका पति बना भिखारी हइ.

बी.एड. त सब पर भारी हइ,बी.एड. त सब पर भारी हइ.

 

कुछु कहत हँ ईमली क आमा,कुछु एकदम ख़ासमखास बने.

भीष्म पितामह बी. एड. क,ज्वाइन कइ तुलसी दास बने.

कक्षा लागइ सिंधु घाटी,मृत भांड पढ़ामा पाठ रोज.

घंटा दूई घंटा बाति करा,गोपिनि से जोरा गाँठि रोज.

 

हइ लका-लक्क सब सूट-बूट,माथे चंदन कइ धारी हइ.

बी.एड. त सब पर भारी हइ,बी.एड. त सब पर भारी हइ.

 

नई नवेली गोपिनि क, हँ रण्ड-मुण्ड पछियान ससू.

इहन महट्टर पुँछत हँ, जोड़ा तउ हबइ लुकान ससू.

रस-गोरस मुरलीधर लइगे,रितई दोहनि लटकाई हइ.

ग्वालन क छाछि धराइ कहीनि, ले चाटा ससू मलाई हइ.

 

जमुना कइ काली दह पैरत,बस एकइ कृष्ण मुरारी हइ.

बी.एड. त सब पर भारी हइ,बी.एड. त सब पर भारी हइ.

 

गहन अध्ययन बिती चला,हइ सूक्ष्म अध्ययन जारी.

अब जईहीं त कबउ न मिलिहीं,पुनि कइ प्राण पियारी.

कान्हा बहती जमुना माही,हान्थ मज़े से धोमा.

उधौ अउर सुदामा बपुरू,फफकि-फफकि कइ रोमा.

 

"गगनउ" के लाने हइ छाई, अब भादौ कस अंधियारी हइ.

बी.एड. त सब पर भारी हइ,बी.एड. त सब पर भारी हइ.

 

 

 


कविता

हमरउ भइसी बिआनि फलाने……….

 

हमरउ भइसी बिआनि फलाने,रकरा नहीं पिआबइ।

दूध-बांध क कुछू न पूँछी,सउहइ मारइ धाबइ।

 

अच्छा खासा मोट-डाँठि हइ,नगद उसड़मड़ फूली।

कुरई भर क ओएन कीन्हे,सोतौ सगली झूली।

ताड़े हमन चोरक्कइ कइसउ,रकरा नियरे जाइ।

दोहनी लइकइ खड़े हमन के,कइसउ भला पेन्हाइ ।

 

काढ़े आँखी पागुर मारइ,छुअइ जाइ लतिआबइ।

हमरउ भइसी बिआनि फलाने,रकरा नहीं पिआबइ।

 

नगद जबा कइ दरिया सोटे,सानी मा मुंहु बोरे।

साल भरे मा ससू सैकड़न,गुढ़ा-गेराइं टोरे।

जबसे इ भंइसान हजारन,रुपिया हइ इ खाये।

डबरा डारइ ढीली त इ,चम्पट लेइ तलाये।

 

बड़ा दुक्ख हइ ससुरी दिन मा,चारि दार नहबाबइ।

हमरउ भइसी बिआनि फलाने,रकरा नहीं पिआबइ।

 

दूध खाइ क लरिकन खातिर,गाँउ म कर्जा कीन्हेंन।

नहीं रही अउकात पइ तबहूँ,एका कइसउ लीन्हेंन।

लीन्हें दोहनी मलकिनि दिन भर,सारि ओसरिया नापइ।

हमका छोड़ी हमरे सगले,खानदान क श्रापइ।

 

कबउ सउंह न बोलइ हमसे,दस अच्छर गरिआबइ।

हमरउ भइसी बिआनि फलाने,रकरा नहीं पिआबइ।

 

कहइ मेहरिया मुनुआ बपुरा,झूरिनि रोटी खाइ भला।

भइंसि तोहारि इ फुटही आँखी,कसिकइ ससू सोहाइ भला।

बीछी किरबा कबउ न सोचेंन,रातिनि ढ़ीलि चरायेंन।

सगले मइके-ससुरे तोहरे,भइंसिनि क गुन गायेंन।

 

महरानी अगड़ाइ न ताका,सगली राति जगाबइ।

हमरउ भइसी बिआनि फलाने,रकरा नहीं पिआबइ।

 

सगल दुपहरी लिहे बगारे,तरसें लरिका पानी क।

जबई बियानी लूँडा दइ ग,तोहरे ऍह महरानी क।

जाइ इआ महबभने के अब,धरे कपारे पूजा न।

छाती मोगरा दइ कइ हमका,चारिउ कइति ते भूंजा न।

 

उल्टा-सीधा बोलइ मन मा,जउनइ ओके आबइ।

हमरउ भइसी बिआनि फलाने,रकरा नहीं पिआबइ।

 

 

गारी सुनि-सुनि कान पकि गयें,तब हमरउ मन डोला।

इआ भइंसि के चक्कर माँही,फटा करेजा बोला।

मइके से जब लउटे काहे,मेहरचउरा जोरे।

सारि बंधी पगुराति रही त,काहे अइरा छोरे।

 

मारइ राँडि पदरुका दिन भरके एका लउटाबइ।

हमरउ भइसी बिआनि फलाने,रकरा नहीं पिआबइ।

 

मूड़ गाड़ि कइ चरे हइ छुट्टा,तोरेंन कस मुड़ियाँन।

लागी-छोरी सबइ करी हइससुरी अबा मोटानि।

सोते मा मुहु डारइ दीन्हे,रकरा नगद चपोटे।

अउखी-पउंखी जबइ हलाई,दुइ डंडा तंइ सोटे।

 

एक चइला गुठुआ मा दीन्हें,जइसइ गोड़ उठाबइ।

हमरउ भइसी बिआनि फलाने,रकरा नहीं पिआबइ।

 

भइंसिनि आइ फुसुर्री ससुरी,आँखी ओखर चढ़ी रही।

इआ सँजीवनि बूटी पाई,चुप्प-चाप उ खड़ी रही।

पुनि कइ अइरा कबउ न छोरे,हे लरिकन कइ मइया।

जतना कहबे दूध इ देई,जइसइ कपिला गइया।

 

"गगन" जउन जे समझइ ओका,ओइसइ जुगुति बताबइ।

हमरउ भइसी बिआनि फलाने,रकरा नहीं पिआबइ।

 

 

 

 

                                                         


कविता

अम्मा माखन चोर न कहु........

 

कान पकड़ि कइ मारू न सांटी,हमहीं तइ चटखोर न कहु।

माठा हेरइ घरे घुसेन तइ,अम्मा माखन चोर न कहु।

 

बाबू कहत हं बबा के जुग म,साढिनि साढ़ी खात रहेन।

बीसन मूड़ा गाइ ढीलि कइ,रोज चराबइ जात रहेन।

हमरे जुग म खूँटा माहीं,लगा न माझा - कानी।

साढ़ी अउर करोनी कइसन,देखी तब न जानी।

 

हूँथड़ कहि ले गदहा कहि ले,पइ हमका तइ ढोर न कहु।

माठा हेरइ घरे घुसेन तइ,अम्मा माखन चोर न कहु।

 

खूँटा से हइ छोरे जबसे,गाइ न आई घरे कबउ।

हेरेन गाँउ मुहल्ला पाएन,जिअत न ओका मरे कबउ।

कहउँ केउ चरबाह न एनकर,इ अपनेन से चरे हमा।

सड़क निहारत जाइ त सगले,एक ठे दुइ ठे मरे हमां।

 

दुक्ख लगा त रोइ लिहेन पइ,हमका भाउ विभोर न कहु।

माठा हेरइ घरे घुसेन तइ,अम्मा माखन चोर न कहु।

 

सगला खेत बगार कइ दिहिन,रुँधी बारी टोरे हाँ।

गाइ भइसि त ढीलेन हाँ पइ,रकरउ ओनकर छोरे हाँ।

नेगा अउर बनेगा ससुरे,चाभे निगद अघान हमां।

रुँधा टाटा चउँका सऊँहइ,मोट डाँठ सडियांन हमां।

 

जइसन कहु त उहइ करी हम,भाखा इआ कठोर न कहु।

माठा हेरइ घरे घुसेन तइ,अम्मा माखन चोर न कहु।

 

इहन से खेदी उहन जाइ कइ,दस दस मूड़ा परे हमां।

अरहरि धानि तिली रंउदे हां,संचइ ओका चरे हमां।

खेदइ जाइ फुसुर्रा अइसन,जइसइ करिया किरबा,

भरी बेढ़ौती बिरबाहींन से,बचा न एकौ बिरबा।

 

जउन मिला हइ धइ ले चुप्पइ,ओका खंखरा रोर न कहु।

माठा हेरइ घरे घुसेन तइ,अम्मा माखन चोर न कहु।

 

एनकर पाला परा न अम्मा,हरे अउर हरबाहन से।

तिथि पमनेउ भर मिला न एनका,दुइ डंडा चरबाहन से।

पूँछि पकड़ि झारियारे मा तइ,जेका कबौ उठाये तइ।

ताके एका मरइ न पाबै,हमहूँ क समझाये तइ।

 

गुर क बाप उहइ कोल्हू हइ,ओका तइ कमजोर न कहु।

माठा हेरइ घरे घुसेन तइ,अम्मा माखन चोर न कहु।

 

 

खाइ भरे क मिला हइ चाउर,गोहूँ मिला न दीदइ क।

बोरी लीन्हे मोल लेइ क,फिरबे कहउ खरीदइ क।

डेहरी छोड़ि चियारे चढ़ि कइ,हइ अकाल नेरिआई रहा।

जानि बूझि कइ बनु न आँधर,काहे नहीं देखाइ रहा।

 

चश्मा अब बनबाइ ले आपन,"गगन" क राम निहोर न कहु।

माठा हेरइ घरे घुसेन तइ,अम्मा माखन चोर न कहु।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

                                                       

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

                


कविता....

 

गोकुल सगला अंगा होइग,ओखर दुक्ख न रोबा।

हम त कहिथे कहऊँ न जा,तूँ एहीं चुप्पइ सोबा।

 

जमुना गईं झुराइ न पउबे,मुंहु धोबइ क पानी।

संदीपनि महाराज हाँ छोड़े,मथुरा कइ जजमानी।

पूजइ खातिर गाइ न पऊबे,नाउ हइ गोकुल धामइ।

जंगल छोड़ा बृंदावन म,चारउ भर न जामइ।

 

हेरे कहऊँ न पउबे देखा,दोहनी, नोई,नोबा।

गोकुल सगला अंगा होइ ग,ओखर दुक्ख न रोबा।

 

नंदगांव म ठेला खुलिगें,गुटका पान अऊ ज़रदा क।

बालसखन क जक्का बंधि ग,नाउ सुनत हर बरदा क।

कालीदह क ठीका होइग,खोदि रहे हाँ बालू सब।

भाँटा मरचा बोबा सगले,भीठे बोये आलू सब।

 

अरहरि खंची गोवर्धन माहीं,लागइ सगले खोभा।

गोकुल सगला अंगा होइ ग,ओखर दुक्ख न रोबा।

 

हम त कालिया नाथेंन भर तै,ई कूंचिन धई मारिनि।

लरिका बच्चा खेदिनि ओकर,बेमउर तक खानि डारिनि।

भूखनि मरति हाँ केउ न पूछइ,नंद बबा के गैया क,

घसिलति लाहाँ बात धरे हइ,हमरे जसुदा मैया क।

 

छोड़ि दिहिनी हइ आश्रम माहीं,तूँ नहबाबा धोबा।

गोकुल सगला अंगा होइ ग,ओखर दुक्ख न रोबा।

 

कंस ममा क लरिका बइठें,बनि कइ मंत्री दिल्ली।

ओनके आगे मथुरा लागइ,जइसइ भीगी बिल्ली।

बेंड़ि दिहिनि बसुदेव क पुनि कइ,धरिनि देवकी मइया क,

सगला खूंटा टोरि के खेदिनि,कामधेनु अस गइया क।

 

सगली दोहनी फूटि परी हाँ,केसे कहइ कारोबा।

गोकुल सगला अंगा होइ ग,ओखर दुक्ख न रोबा।

 

ढींठ पूतना शिशुपाल क,हमहिनि रहेन तइ मारे।

ओकर नाती लरिका सगला,हमाँ मुकदमा डारे।

महल रहा बुलडोजर ढोसिसि,बचा न डेहरी फरिका।

केके माथे लड़ी बताबा,अर्जुन बचें न लरिका।

 

चक्र शुदर्शन भेजेन मथुरा,पहुंचा जाइ महोबा।

गोकुल सगला अंगा होइ ग,ओखर दुक्ख न रोबा।

 

 

चीरहरण क केके संघे,कहाँ कहाँ हम धाएन तइ।

टेप करे हाँ नाचब गाउब,जतनी रास रचाएन तइ।

कागज पाथर रखे हाँ संचइ,सगले आवाजाही क।

कौरवबंस निहारे पेशी,ताड़े हबइ गवाही क।

 

दहिने कहबे बायेन जइहीं,कतनिउ अरई गोभा।

गोकुल सगला अंगा होइ ग,ओखर दुक्ख न रोबा।

 

द्वापर के मुद्दा क सोचा,कलजुग लाइ उठाए हाँ।

गोपीनि के आड़े से हमका,तोहंका पठइ बलाए हाँ।

पूजा मंदिर मुद्दा हइ बस,केबल जीतइ हारइ क।

पुलिस क दइ बंदूक कहे हाँ,देखतइ गोली मारइ क।

 

लीला देखा लीलाधार कइ,"गगन" कहऊं न बोबा।

गोकुल सगला अंगा होइ ग,ओखर दुक्ख न रोबा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

                


कविता

 

एक ठे रचना लिखई चलेंन त,सब अच्छर बउराने।

शब्द दिखिनि त दउड़ि परें,ऊ मूड़े चढ़इ फलाने।

 

रस क देखी राति-राति भर,सगला रहा पढ़ाबा।

पठयेन लेइ समास त ससुरा,अलंकार लइ आबा।

 

संज्ञा सर्वनाम क देखि कइ,मंद-मंद कुछु हरखी,

क्रिया भूकुरि कइ डारिसि ओकर,सगली तेरही बरखी।

 

चुप्पइ बइठि विशेषण बपुरा,आपन साही हाँके हइ।

प्रत्ययउपसर्ग क डेहरी,चारि दिना से ताके हइ।

 

अनुप्रास भाखा से बिगड़ा,आपन साही अइंठा हइ।

यमक दुइमुंहा श्लेष से चिपका,कान भरइ क बइठा हइ।

 

इया गनीमत मानी बहुतइ,बहुब्रीह संभारे हइ।

द्वंद के सगली करतूतिन पर,अजुअउ परदा डारे हइ।

 

इया तत्पुरुष चुप्पा हइ पइ,हुशियारी त छाँटे हइ।

साझे म कुछु शब्द रहें त,ओनहूँ काहीं बाँटे हइ।

 

गिनती माहीं द्विगु आगे हइ,ओठउ आपन सिये हबइ,

जब से सुनिसि प्रशंसा तब से,करमउधारइ पिये हबइ।

 

करत रहेन अव्ययीभाव से,चरचा चारि महीना से।

कसिकइ राज निकारी सगला,कहिअउ येके सीना से।

 

अंतिम आस बची हइ केवल,संधि क लीन्हे टहरित हइ।

एके डेहरी ओके डेहरी,सगला दिन हम डहरित हइ।

 

संधि जो करी एकट्ठा एनका,अपना कांहि बताउब।

हांथ जोरि कइ करी निवेदन,तबहिनी अब लिखि पाउब।

 

 

 

 

 

               


हिंदी दिवस पर विशेष

”"""""""""""""""""

इआ डेहरी से निकरि अंटारी चढ़ई,

नित मांन बढई हठखेली करइ।

रस छंद समास भरे अंचरे,

गुडधानी भरी गुड़भेली बनइ।

मन जोरइ करेजा करइ हरियर,

महतारी के जइसन पियारी लगइ,

हिंदी जन-भाखा बनइ सब का,

पइ विंध्य क भाखा बघेली बनइ।

 

दफ़्तरन म फूलइ-फलइ हिंदी,

गंगा कस धारि बहइ सगले।

तुलसी मीरा रसखान लिखइं,

मन मां विसुआस भरइ सगले।

आखर-आखर जुड़ि जाइ करइं,

गीता रामायन कइ रचना,

इआ लोक पढ़इ परलोक सजइ,

मन धोबइ विकार हरइ सगले।

 

भारत माता से जुड़इ नाता,

गरजै नित नाहर के जइसन।

पूजी पथाई मनाई इआ दिन,

तीजि तिहारान के जइसन।

देउता कस पूजा करइ दुनिया,

इआ हिन्द के माथे क लाली बनइ,

हिंदी कइ मशाल मिशाल बनइ,

धधकइ इ अंगारन के जइसन।

 

सब बोलैं पढ़ै अउ लिखइं हिंदी,

इआ मेघन कस घहरात चलइ,

देश-विदेश म मांन बढ़इ,

हिंदी कइ ध्वजा फहरात चलइ,

रोकेउ से न कईसौ रुकई हिंदी,

न त केहू के आगे झुकइ हिंदी,

दइअउ म तिरंगा के जइसन,

सबसे आगे लहरात चलइ।

 

 


 मुक्तक

समझी नेता आइ

 

हमका तोहका बांटइ समझी नेता आइ।

आन क बोबा काटइ समझी नेता आइ।

पाबय जतना खाइ के फूला परा रहइ,

अपनइ ओछरा चाटइ समझी नेता आइ।

 

सुलगत मुद्दा बारइ समझी नेता आइ।

जीतै चाहै हारै समझी नेता आइ।

फुनगी पाबै फुट त सीधे खुटुकि देइ,

जिअइ देइ न मारै समझी नेता आइ।

 

अपुनइ पाथइ पोबइ समझी नेता आइ।

मरेउ जिये न रोबइ समझी नेता आइ।

लिहे नहन्नी घाउ दिहिसि त ताके हइ।

मउका मिलइ करोबइ समझी नेता आइ।

 

ढील ढाल न कंसइ त समझी नेता आइ।

लूटइ पइ न फंसइ त समझी नेता आइ।

नहां म ठोकइ फाँस रोबाबइ जनता क,

आपुन चुप्पइ  हंसइ त समझी नेता आइ।

 

हमका बारै खोबै समझी नेता आइ।

आपुन चुप्पे सोबै समझी नेता आइ।

कतिकहइ त छोड़ा चलइ आषाढी न,

कतनौ अरई गोभइ समझी नेता आइ।

 

                 

 

 

 

              


कविता

गांधी बाबा आइ जई

 

सत्याग्रह क पाठ सबै क पुनि कइ आइ पढाइ जई।

लूटिनि देश क नेता मिलि कइ समझां त समझाइ जइ।

लागत हइ इ तबहिनि मनिहीं खासा निकद गोदाहे म।

चाही इनका जरतइ चइला निकहा हुमसि पिठाहें म।

 

अंइचड़ ससुरे रेन्द बने हां अपनौ आजु रेंदाइ जई।

लाठी छोड़ि लुआठी लइ कइ गांधी बाबा आइ जई।

 

महक़त देश हमार रहा तइ मरजादा त लूटि लिहिनि।

करतूतिनि क केउ न जानइ माचिस मारिनि फूटि लिहिनि।

बहिनि अउर बिटिया काँपति हां निकरै नहीं पटउहें से।

जेका दिखिनी उठाइ लेत हां थाना पुलिस के सउहें से।

 

सत्ति अहिंसा छोड़ी सीधे नटइ डंडा नाइ जइ।

लाठी छोड़ि लुआठी लइ कइ गांधी बाबा आइ जइ।

 

अपना केवल खड़े रही अउ हमका देइ कूता से।

हम बल भर सोटबाई बाँधि के खासा एनका खूँटा से।

कबौ दुबारा नाउ न लेइहीँ जनता एनका गढ़े रही।

देखी पुलिस न मारय हमका एह से अपना खड़े रही।

 

चारि दिना म सड़ होइ जइहीं सगली अकड़ि पटाइ जई।

लाठी छोड़ि लुआठी लइ कइ गांधी बाबा आइ जइ।

 

सुनेन कबौ पकड़ान रहें पइ छुट्टा सगले घूमि रहें।

अपनइ काहीं डारे जेबा जब देखा तब चूमि रहें।

नहीं बताबै केउ के आखिर एनका कबै निकारिसि के,

मरी जउन त पूछै बपुरी ओका आखिर मारिसि के।

 

घुटकी सांग हुलेलइ कउनौ अइसन करी उपाइ अई।

लाठी छोड़ि लुआठी लइ कइ गांधी बाबा आइ जइ।

 

निकहा निकहा घोड़ बेरायेंन लगा काम त ढोर निकरिगें।

चौकीदार नबा हेरेन पइ ओऊ त सगले चोर निकरिगें।

सत्ति त हेरे मिली न बापू झूठिनि झूठि उड़ेले हां।

सूजी जहां सकाइ न ओहूँ सइला सँचइ ठेले हां।

 

मनई क जिउ जरा जात हइ अपना अउब जुड़ाइ जई।

लाठी छोड़ि लुआठी लइ कइ गांधी बाबा आइ जइ।

 

 

 

 

पइसा मिला त बंटि ग सगला मोती डुग्गू टॉमी म।

जनता बिना दबाई मरि गइ फ़इली इआ बेरामी म।

चंगू मंगू लूटां बल भर अपुनइ भगत शुभाष बने हां।

मुलुर मुलुर बस नमो निहारां कहै क तुलसीदास बने हां।

 

झूँठि मूठि क गांधीगीरी मरजादा सब खाइ जई।

लाठी छोड़ि लुआठी लइ कइ गांधी बाबा आइ जइ।

 

बची न कैसौ देश मरि जइ मरजादा क ताकी देखी।

संविधान क पोथी खोली ओका पुनि कइ झांकी देखी।

संसद माहीं जइसन चाहिनि ओका टोरे गढ़े हमां।

रऊंदि कइ सब कानून धरे हां सउहइ छाती चढ़े हमां।

 

वैष्णव जन बनि जातें कइसौ रघुपति राघव गाइ जई।

लाठी छोड़ि लुआठी लइ कइ गांधी बाबा आइ जइ।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


कविता

जजमानी

 

भइया साही मारिथे हमहूँ भउजी के परधानी म।

सगले लीन्हे पोथी घूमी, बिन ओरगी जजमानी म।

 

सोचेन तइ महाराज बनइ क

कका क कइसउ साटेन

आपन सगला ज्ञान बइठि कइ

संझा ओनसे बांटेंन

 

कुसा चटाई पोथी पत्रा

होड़सा चंदन खासा

नउरात्रि म रहेन निर्जला

हमहूँ निकद उपासा

 

रत्तिउ कमी होइ न दीन्हेंन हम ओनखे महिमानी म

सगले लीन्हे पोथी घूमी, बिन ओरगी जजमानी म।

 

घंटी घरी घंट सब लीन्हे

छाती फारि बजाएंन

जउन बना त आड़ा तिरछा

नटइ फारे गायेंन

 

गयेन बजारे हेरेन सगले

जतना जउनइ पाएंन

सत्तिनरायन कथा चालीसा

करम कांड लइ आएंन

 

माठा साही मथि डारेन हम आपन ज्ञान मथानी म

सगले लीन्हे पोथी घूमी, बिन ओरगी जजमानी म।

 

तख्ता म बइठाई ओनका

दइ कइ पोदी पइया

दरी बिछाए भरा चौतरा

चेला बइठाँ भुइयां

 

हर परसंग बतामा जइसइ

एही ससुरा घटा रहा

गीता अउ रामायण सगला

सुद्ध अम्मलक रटा रहा

 

आधी पूजा कइ डारां उ घुसुरे बइठ नहानी म

सगले लीन्हे पोथी घूमी, बिन ओरगी जजमानी म।

 

सूरदास क राज न पाई

सोये हां के जागे

बिन मतलब क बीन बजाएंन

खड़ी भइंसि के आगे

 

कइसउ मइसउ एक दिन हमरे

सूरुज उएं अंटारी

अतनी चढी बोखारि कका क

हेरे मिलइ न नारी

 

मौका पाएन माछी साही चपकि गएन गुडधानी म

सगले लीन्हे पोथी घूमी, बिन ओरगी जजमानी म।

 

सुनहर पाएन एक दिन हमहूँ

धीरे से समझाएंन धइ

पर्ची माहीं लिखी बेरामी

बगली सटे सुनाएंन धइ

 

सगली दे जजमानी हमका

अब न कउनौ काम करा

राम नाम क जाप करा अउ

पहुडे निकद अराम करा

 

जरा करेजा अब न अउटा देखा इआ सयानी म

सगले लीन्हे पोथी घूमी, बिन ओरगी जजमानी म।

 

बइठे बइठे कथा लहाबा

घूमा फिरा चेलाने म।

बरहौं काज बिआह कराबै

हमहिनि जई कोलाने म।

 

मोतियाबिंद हइ आँखी माही,

पंचर दूनौ कान हमां।

चमरऊटी अहिरानेउ म सब,

तोहरइ त जजमानं हमां।

 

बइठा गिना दच्छिना चुप्पे, पल्थी मारे छानी म।

सगले लीन्हे पोथी घूमी, बिन ओरगी जजमानी म।

 

मंत्र संत्र सब आगी लागइ

चंदन हमका घोटइ दे

पीपर छोड़ि बरा पुजबाई

चुप्पइ हमका सोटइ दे

 

 

 

भूत प्रेत अउ टोना जादू

सब कुछु एकै जइसा हइ

झार फूंक कमजोर न माना

एहूं म खुब पइसा हइ

 

हर्र फिटकिरी बिना अई अब चोखा रंग किसानी म

सगले लीन्हे पोथी घूमी, बिन ओरगी जजमानी म।

 

एकै पोथी चलइ दे देखा

घाटे कथा सतइसा म।

सगली पुन्नि बताबा सब क,

दान दच्छिना पइसा म।

 

पउआ भर घिउ होम देइ क

बदले मिलइ भभूती

दूनौ जन मिलि झारी डारी

आगी म एक सूती

 

सोटी दूध मलाई  लागइ आगी दाना पानी म।

सगले लीन्हे पोथी घूमी, बिन ओरगी जजमानी म।

 

मथुरा भेजां भीम भरत क

कंश क चकनाचूर करइ

हनुमान सेना लइ पहुंचाँ

गोपिनि क दुख दूर करइ

 

कउनउ किस्सा कहंउ से जोरी

आपन साही हांकै दे

धुआं रोसइयां निकरत लाहै

बटुई बटुआ ताकै दे

 

श्रोतउ सगला तारी पिटिहीं हमरे नई कहानी म

सगले लीन्हे पोथी घूमी, बिन ओरगी जजमानी म।

 

माया अइसन होइ जउन के

रुपिया खुब बरसाबइ

तौने हमरे हींसउ माही

पनसउआ त आबइ

 

टोना जादू जनम कुंडली

मरनी जरनी घाटे म

भूत परेत अउ देवी देउता

सब क लिहेन लपाटे म

 

चुनी खरी पिसान मिलाइ हमहिनि बूसा सानी म

सगले लीन्हे पोथी घूमी, बिन ओरगी जजमानी म।

 

बरम सउँह भें पठबइ लागे

पूजा कथा सतइसा म

आधे आध होइ बंटवारा

सगले रुपिया पइसा म

 

निकहा चका चक्क हइ देखी

कका क महिमा गाइ रहेंन

खूब चढ़इ फल फूल मजे से

पहुड़े घरे म खाइ रहेंन

 

"गगन" भूत टहराबइ लागें लंका के रजधानी म

सगले लीन्हे पोथी घूमी, बिन ओरगी जजमानी म।

 

 

 

 

 

 

 

 

                


दसराहा

 

आजु आइ दसराहा देखी,

दोहपन सबै उतारी धइ।

अतना रामन हमां उधान

जउनइ मिलैं त मारी धइ।

 

अच्छा मौका राम बनै क,

कहउँ से कइसउ छोड़ी न।

मूड़े कहौं कलंक न लागै,

रीति  रिवाज    टोरी न।

 

हम तउ देखी लगे हैंन अब,

शकुनिउ    निपटाबइ म।

पांसा ओकर टोरि टारि कै,

निकहा सबक सिखबइ म।

 

आजु पछीती माहीं अपने,

धोबत  हाँथ  देखान  रहें।

बांधे मास्क मुहें म अपने,

भितरे  ससू  सकान  रहें।

 

निंचिनि काहीं रामन निकरा,

व्यस्त  रहा  तइ  चेंजिंग म।

सगला  मूड़  देखाने त पइ,

सब  शोसल  डिस्टेंसिंग म।

 

पकडी हाँथ बढ़ाएंन देखी,

रोइ   दिहेन   मजबूरी  म।

रहें त  सगला  मूड सामने,

पइ  एक  मीटर के दूरी म।

 

आसउँ  इ दसराहा  देखी,

मन म कीन्हिसि चोट ससू।

एक  मीटर  के  दूरी  माहीं,

हाँथउ  परिग   छोट  ससू।

 

आसउँ केर त बीता कइसौ,

परु कइ  आस  निहारे हन।

तब तक सगली जिम्मेदारी

तोहरेन  ऊपर   डारे  हन।

 

 

 

 

 

रामन महिषासुर शकुनी क,

सोचब  पइ  अब  रीते  पर।

मारब देखा  छोड़ब  न पइ,

इआ   कोरोना   बीते   पर।

 

अइसै एनका जियै खाइ दे,

छाती   सोमा   सूतइ   दे।

खूब अनीति करै दे एनका,

मूड़े  चढ़ि   कइ   मूतइ  दे।

 

घड़ा भरि जइ जउने दिन त,

पाप उहइ  दिन स्वाहा होई।

भस्म होइ जइ अधरम देखा,

उहइ   रोज   दसराहा   होईं।

 

 

 

 

 

 

 

 

                      


जिन्नगी

 

बड़े  सकन्ने  सोचेन हमहूँ,

लरिका लीन्हे  कनिया म।

 

लागै सीधे पलटी धइ अब,

रक्खइ का  हइ दुनिया म।

 

संझा लउटि दुआरे आएंन,

अंगनौ लगइ  अपामन के।

 

अइसी तइसी के करबाबइ,

जाइ  सगल महबाभंन  के।

 

जउन  मिलइ  संतोष  करा,

तूँ जतना  जेकर होइ भला।

 

इहई  आइ  जिंदगी  समझे,

जिये  चला अउ जिये चला।


गजल

 

काकू आहे का...........

 

दुपहर म कइलान परे ह, काकू आहे का।

पेड़े तरी उतान परे ह, काकू आहे का।

 

पानी म अट्ठासी परि गइ, सगली धानि गलेथी,

तूँ छोले खरिहान परे ह, काकू आहे का।

 

खहराबा अस खेत निहारत परिखे हां दु बूंदी क,

ककरी अस दहरान परे ह, काकू आहे का।

 

करजा खातिर बेउहर ताके बइठे डेहरी मांहीं,

टटिया देहे लुकान परे ह, काकू आहे का।

 

खटिया परी बेराम मेहेरिया बिटिया कहाँ बियाही,

लीले दुक्ख अघान परे ह, काकू आहे का।

 

देहे बोट त मंत्री बनिगे काटी अंगुरी मूतिनि का,

गुड़ जइसन सिहिलान परे ह, काकू आहे का।

 

इया नबा कानून बना पइ पतरी पर के बाघइ अस,

पढे लिखे बउरान परे ह, काकू आहे का।

 

ताके हइ सरकारी अमला खलरी चला उचेरी धइ,

गोहटा अस पटियाँन परे ह, काकू आहे का।

 

उज्जर बज्जर "गगन" क देखा पूजा चला मनाबा तूँ,

हेरत तूँ देउथान परे ह, काकू आहे का।

 

 

 

 

                                        


गीत

रामा लउटि घर अइहीं

 

रामा लउटि घर अइहीं सुना हो सखी।

सब मिलि मंगल गइहीं सुना हो सखी।

 

रतिया झोपड़िया मां कतनी बिताईनि हो,

जिउना अउटि घर अइहीं सुना हो सखी।

 

भुइयां कचेहरी से कइसउ के पाईनि हइ,

मंदिर मां काम लगइहीं सुना हो सखी।

 

अतनी मशक्कति से मस्जिद ता टूटी हो,

ऊंची बखरिया बनइहीं सुना हो सखी।

 

परजा का मिलि गइ सेना से मुक्ति हो,

सरजू मां दीप जलइहीं सुना हो सखी।

 

राम लखन सिय हनुमत क पूजा कइ,

धन्य"गगन" होइ जइहीं सुना हो सखी।

 

 

                                                

कविता

 

इआ लाकडाउन मा लरिका,

सब पढिहीं मोबाइल मा।

आफिस सगला घरे से चलिहीं,

काम देखइहीं फाइल मा।

आहत का राहत पहुँचइहीं,

नेता टीवी चैनल मा।

छोट छोट मुद्दन क लइकइ,

बहसउ करिहीं पैनल मा।

छोटकऊना हइ काल्हि से उलझा,

गुणा भाग अउ जोड़ मा।

बीस लाख क कसिकइ लिक्खी,

पापा उहउ करोड़ मा।

 

 


गजल

फलाने

 

कसिकइ होइ काम फलाने।

नींछिनि खलरी चाम फलाने।

 

बिगड़े हमां अन्न का दाता,

सगला रस्ता जाम फलाने।

 

खेती खेत बगार बेचइहीं

अउने पउने दाम फलाने।

 

खादी बीज बिसार म होइ,

सत्तिनि रामइ नाम फलाने।

 

लऊआ भिंडी जनगाथी क,

भूंजे डारइ घाम फलाने।

 

चउमस माहीं बाह न लागी,

बरदा हमां बेराम फलाने।

 

हइ चुनाउ अब रोज घूमइहीं,

तोहका चारिउ धाम फलाने।

 

काल्हि सुनेन परधानउ मरिगें,

पकड़े रहा जुखाम फलाने।

 

"गगन"भएँ दलबदलू जब से,

सोउब हबइ हराम फलाने।

 


            गजल

                तब देखा कुछु कहे न देखा

 

तेरही बरखी घाल होइ जई, तब देखा कुछु कहे न देखा ।

बहुतइ बड़ा बबाल होइ जई, तब देखा कुछु कहे न देखा ।

 

कइसउ काहीं एह चुनाऊ म, जीति गयें जो नेता जी ,

मनई त कंगाल होइ जई, तब देखा कुछु कहे न देखा ।

 

सबहिनि क रोजिगार क झटका, बिजली पानी घरे घरे,

मुरगा ससू हलाल होइ जई, तब देखा कुछु कहे न देखा ।

 

रत्तीउ भर विसुआस न कींन्हें, फफका रोमाँ जउन करां,

जिये केर जंजाल होइ जई, तब देखा कुछु कहे न देखा ।

 

आपन मतलब साधइ खातिर, फुकिहीं कान मेहेरियन केर।

मुघुनी छंटी दलाल होइ जई, तब देखा कुछु कहे न देखा ।

 

हरिया घरिया भुकतत बपुरा, चेंचुरा धइ घसिलइहीं जब,

खलरी उधिरी लाल होइ जई, तब देखा कुछु कहे न देखा ।

 

नीक मानि कइ काकू एनकर जउन मलाई छानेन हइ,

जियइ न देइ काल होइ जई, तब देखा कुछु कहे न देखा।

 

"गगन" झुराइ के काँटा होइगें सुसके हमाँ अमहरी अस,

जिततइ फूला गाल होइ जइ तब देखा कुछु कहे न देखा।

 

 

 

 

 

 

 

        


 

गजल

देखा बंद करा

 

दरकी गगरी ताउब, देखा बंद करा।

भूतन क नहबाउब, देखा बंद करा।

 

खंखरउ भर न झलकै, जेके पेंदी म,

कुठुली उआ उताउब, देखा बंद करा।

 

जउन कही त हमरौ, कबहूँ सुनबे का,

अपनइ आपन गाउब,देखा बंद करा।

 

सउहैं सउँह बताइ, न जानै लापाचीपी,

ओका चुप्प कराउब, देखा बंद करा।

 

पेटे खातिर कुछु कइ देई, मानेंन पइ,

रोटी दइ ललचाउब, देखा बंद करा।

 

मूँदा छोपा जउन, परा हइ परा रहइ,

मुद्दा उहइ उठाउब, देखा बन्द करा।

 

मरि ग राह निहारे, तबहूँ मिले नहीं,

ऐरउ आँसु बहाउब, देखा बंद करा।

 

कइसौ काहीं भुइयां क, निपटारा भ,

कोठरी म अरझाउब, देखा बंद करा।

 

कूबति होइ त करा, नहीं त ओढ़ा न,

रातिउ दिन टहराउब, देखा बंद करा।

 

लूटा बेढ़ा सगला, एहीं धरा रहि जइ,

पेट काटि जुहुबाउब, देखा बंद करा।

 

ताके हमां जे, आँखी काजर काढै क,

ओनका घरे घुसाउब, देखा बंद करा।

 

कखरी मूँदे बड़मंसी क परी रहइ दे,

चउरे केर कंड़ाउब देखा बंद करा।

 

मरजादा त "गगन" क, काटे पउले धइ,

सेंतिउ क सहराउब, देखा बंद करा।

 

                  


ग़ज़ल

बताबा कहाँ जई

 

हमन लगाए जोर बताबा कहाँ जई।

विपदा हइ का थोर बताबा कहाँ जई।

 

जेइ नहीं ते हमहिनि काहीं हुमसे हां।

समझे हां कमजोर बताबा कहाँ जई।

 

चुप्पइ कोने परे रहेंन अंधियारे मां।

मूड़े धरिनि अंजोर बताबा कहां जई।

 

अरहरि लाएं उहौ फलाने करजा म।

आधा निकारी रोर बताबा कहाँ जई।

 

सामन भादउँ बीत दइउ क ताके हन।

कसिकै नाचइ मोर बताबा कहां जई।

 

छाती फॉरेन उनहिनि के जसगांनी  म।

तबउ भएँन मुँहुचोर बताबा कहाँ जई।

 

घोड़ लिहेन पइ ओहूँ माहीं धोखा भ।

सगल निकरिगें ढोर बताबा कहाँ जई।

 

भूंजिनि धइ अब चुप्पे ताके बइठे हां।

चाटी होइ जां गोर बताबा कहाँ जई।

 

नटई दाबां कहाँ के कइसउ रोये न।

अतना हमां कठोर बताबा कहाँ जई।

 

लीन्हे हां बड़मंसी तबहूँ सोचित हइ।

बनी रहइ गंठिजोर बताबा कहाँ जई।

 

गगनउ पकड़े धारि बहि गयें संघे म।

मिला न ओरउ छोर बताबा कहाँ जई।

 

 

 


ग़ज़ल

मुन्नी कइ महतारी सुनि ले

 

मुन्नी कइ महतारी सुनि ले।

खोंसे न चिनगारी सुनि ले।

 

ओनके ठाटे आगी लेसबे,

तोरउ जरी अंटारी सुनि ले।

 

अँगने बइठि भिड़ाये हइ त,

नगद बिसरही गारी सुनि ले।

 

साहुति घरे क टूटि जइ तब,

फुटिहीं कइउ दुआरी सुनि ले।

 

जंगल कटि खरिहान होइ गये,

अतनी चली कुल्हारी सुनि ले।

 

पइसा माहीं दफ़तर बिकि गें,

बिकें सबै अधिकारी सुनि ले।

 

एह महगाई बची न कइसउ,

टाटिया फरकी बारी सुनि ले।

 

स्कूलन क बंद कइ दिहिनि,

सगले खुली कलारी सुनि ले।

 

रकरन काहीं अदला बदली,

हइ कटारि दुइ धारी सुनि ले।

 

मंदिर मस्जिद लड़ें जक्क हँ,

आपन किसन मुरारी सुनि ले।

 

तोरे खातिर "गगन" क कुटिया,

काल्हि बनी पइठारी सुनि ले।


गजल

 

कुछु अपनउ कहब का,,,,,,,,

 

 

करी के न करी, कुछु अपनउ कहब का।

सुलगी के हम जरी, कुछु अपनउ कहब का।

 

कुठुली भरे क दाना, सब बोइ दिहेन हइ,

पाकी ससू के बरी, कुछु अपनउ कहब का।

 

भइंसी केउ मारि दिहिनि, टूटि परी हइ,

ढीलेन कहौं चरी, कुछु अपनउ कहब का।

 

नाटा बदान हां, दुनउ क कांधि फूलि हइ,

कसिकइ जुआँ धरी, कुछु अपनउ कहब का।

 

गल्लउ दीहिसि त अतना, सरकार सोचि कइ,

उ फूंका त हम जरी, कुछु अपनउ कहब का।

 

हांथे नहीं अधेला, हइ बिटिया सयानि देखी,

काजे बिना परी, कुछु अपनउ कहब का।

 

होमउ गरास दीन्हेन, पइ भुन्न हमाँ देउता,

निकरी गरी सरी, कुछु अपनउ कहब का।

 

सगले घरे म दुक्ख त, सिहिलान हबइ पसरा,

बतकी के अब मरी, कुछु अपनउ कहब का।

 

बपुरु लिखिनि "गगन"त चली गाइ दिहेन हम,

जइसइ के भरथरी, कुछु अपनउ कहब का।

 


 

 

ग़ज़ल

स्कूलि चलें दादू।

 

महतारी कइ कनिया भूलि चलें दादू.

बस्ता क टागि कइ स्कूलि चलें दादू.

 

पहिरि लिहिनि सल्ट पैंट तानि लिहिनि मोज़ा,

झारि  कइ  देहें  क धूरि  चलें दादू.

 

आँजि लिहिनि काज़र औ पारि लिहिनि पाटी,

खाइ कइ कठउता भर फूलि चलें दादू.

 

रिक्शा क खर्चा औ  फीस  केर बर्छी,

सन्चै  करेजा  म  हूरि चलें  दादू.

 

क ख औ ग घ म बूडि गये अइसन,

पहिलै म चारि साल झूलि चलें दादू.

 

बेन्चि कइ किताबन क खाइ लिहिन गुल्फी.

मानि कइ पढ़ाई फिजूलि चलें दादू.

 

बाप अउर पुरिखन कबनारहा जतना,

मेटि बेडि सगला निर्मूलि चलें दादू.

 

 

                  

 

 

 

 

 


 

 

गजल .

नइकी दुलहिया

 

डेहरी म अँसुअन के धारि छोडि आई हइ..

नइकी  दुलहिया ससुरारि छोडि आई हइ.

 

काजे म जउन कुछु मइके म पाइसि तइ

हांथे कइ मेहदी,स्रिंगार छोडि आई हइ.

 

मेहरारू छोडि ससू, कार जउन मागइ त,

अइसन उ जाहिल, गमार छोडि आई हइ.

 

राति दिना फफकति हइ भीति के आड़े म,

जइसइ के सगला भड़ार छोडि आई हइ.

 

सासु बहुत रोबति है पढ़ी लिखी पुतउ क,

छोलइ क ओकर बगार छोडि आई हइ.

 

जउने म बपुरी क चाहिनि तइ जारइ क,

अँगने म कॅंडा उजारि छोडि आई हइ.

 

इहउ हबइ मुद्दा कुछु एहूँ पर सोचा त.

सोचइ क एक ठे विचार छोडि आई हइ.

 

 

 

 

 

 

 

 

                 

 

 

 

 

 

 

 

गजल

अम्मा हमां उपासे हरछठ

 

अम्मा हमां उपासे हरछठ के पामन तेउहार क।

पत्ता अउर मुखारी खातिर लरिका चलें पहार क।

 

बाबू हर अउ जुआं क हेरां सगले सारि बुसउला मां,

पूजउ खातिर मिलइ न हेरे टुटहउ कहउँ उधार क।

 

इआ मशीनी जुग मां देखी हर बरदा सब बिसरि गयें,

कल्टीवेटर खाइ लिहिसी ओहं नगरा चौहीं फार क।

 

पत्ता धरे रोहिनी बपुरी बइठि निर्जला ताके हइ ,

एह युग का बलभद्र बिसरिगें ओके नेह दुलार क।

 

पड़िया बाली भइसि के आगे पड़वा मरें हेराइ गयें,

दहिउ बिना भइ तेरही आसउं सगले सुदिन सुतार क।

 

पुलिश ससू दौडाबति लाही चारिउ कइती बंद हबइ,

फसही चाउर लेइ के लाने कसि कइ ज़ई बज़ार क।

 

तेउहारे क धइ कइ सगला निकहा महुआ बेचि दिहेन,

चुरा न ससुरा कतनौ चुरइनि जइसइ रोरही दारि क।।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

                                   

 

 

 

 

 

 

गजल

फइला ससू कोरोना हइ

 

पैदाइश क दिन हइ भाई फइला ससू कोरोना हइ।

नहबाई के हाँथ धोबाई फइला ससू कोरोना हइ।

 

पउआ अद्धी छानइ खातिर दोस्त बिचारे ताड़े हां,

केके केके मास्क लगाई फइला ससू कोरोना हइ।

 

मुरगा,अंडा, खातिर बपुरे साल भरे से परिखे हां,

कसिकइ रोटी नोन खबाई फइला ससू कोरोना हइ।

 

हाँथ मिलाई जोरी या के दौड़ि कइ सीधे गले मिली,

या के ओनका दूरि भगाई फइला ससू कोरोना हइ।

 

मम्मी कुछू बनाई लरिका चूल्हा कइति निहारे हां,

बंद हबइ सब का मगवाई फइला ससू कोरोना हइ।

 

घरे रहा हम माने हन बस आसउँ खातिर माफ करे,

फोनई माहीं मिलइ बधाई फइला ससू कोरोना हइ।

 

ईद बीति गइ राखी लीन्हें बहिनी सगली ताके हां,

केका कइसन का समझाई फइला ससू कोरोना हइ।

 

कोरोना कइ चैन इ ससुरी "गगन" क भितरे बेड़े हइ,

आपन बिपदा केसे गाई फइला ससू कोरोना हइ।

 

 


 

गजल

मोबाइल अउर पढ़ाई.....

 

लरिका सगला घुसिगें भितरे लीन्हे फोन पटउहें म।

अर्जुन क अब शिक्षा देइहीं इ गुरु द्रोन पटउहें म।

 

बंधी दुआरे बूसा ख़ातिनि गाइ भंइसि नेरिआइ रहीं,

लाला दइके ताला घुसिगें होइगे मौन पटउहें म।

 

रातिउ कइ चपकाइ के सोमा मोबाइल क छाती से,

जइसइ कतना मिलिगा एनका चांदी सोन पटउहें म।

 

चार्ज बैटरी डाउन होइगइ देखतइ ससू महट्टर क,

लिहे नसेनी टाबर हेरां चारिउ कोन पटउहें म।

 

"गगन" निहारे राति राति भर ताके हमैं बियारी क,

इआ पढ़ाई बन्द कैदिहिसि रोटिउ नोन पटउहें म।

 

 

 

 

                                                        

 

 

 


कविता

रोका इआ कोरोना क,,,,,,,,

 

गली गाउ घर बार पहुँचि ग रोका इआ कोरोना क।

आजु पचासा पार पहुँचि ग रोका इआ कोरोना क।

 

लरिका बच्चा घरे म बपुरे चुप्पइ दुबके परे हमा,

कस्बा अउर बज़ार पहुँचि ग रोका इआ कोरोना क।

 

जिआइ न देई लागत हइ अब जई त आखिर कहां जई,

खेतउ छोड़ि बगार पहुँचि ग रोका इआ कोरोना क।

 

सोचिथे सब छोड़ि छाड़ि कइ मनई बसइ जंगले म,

चुप्पइ चढ़ा पहार पहुँचि ग रोका इआ कोरोना क।

 

झटका ससुरा बहुत दिहिसि अब सौंहै सौंह हुलेलइ क,

लिहे खुली तलवार पहुँचि ग रोका इआ कोरोना क।

 

शर्दी खांसी देह गरम क लच्छन कबउ सुनात रहा,

अब तउ बिना बोखार पहुँचि ग रोका इआ कोरोना क।

 

मारि कुंडली बइठा अइसन ससू उठइ क नाउ न लेइ,

जस बरदा गरियार पहुँचि ग रोका इआ कोरोना क।

 

थूंथुन बांधे "गगन" क देखि कइ जेइ नहीं ते सोचत हाँ,

इआ कउन हत्यार पहुँचि ग रोका इआ कोरोना क।।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

गजल

काकू इआ कोरोना म.......

 

मानित हइ कुछु बोर होइ गयें, काकू इआ कोरोना म।

काला रहें त गोर होइ गयें,काकू इआ कोरोना म।

 

हवा चलइ लहरात मिलां जे,गली अउर चउराहा म,

उ खच्चर से ढोर होइ गयें,काकू इआ कोरोना म।

 

नउकर चाकर गाड़ी बंगला,घरे परे पगुरात रहें,

नाचत नाचत मोर होइ गयें,काकू इआ कोरोना म।

 

प्रेम मुहब्बत वाले सगले,राति राति भर जागि मरें,

चंदा ताकि चकोर होइ गयें,काकू इआ कोरोना म।

 

चीकन भूकन मुहु हइ तबहूँ,ओन्ना बांधे घूमत हाँ,

सब बपुरे मुहुचोर होइ गयें,काकू इआ कोरोना म।

 

दाना पानी छोड़ि घरे म,कोरेनटाइन परे परे,

"गगन" बहुत कमजोर होइ गयें,काकू इआ कोरोना म।।

 

 


गजल

इआ कोरोना भागि जई

 

सब जन आपन फ़र्ज़ निभाभा, इआ कोरोना भागि जई।

शासन क मजबूत बनाबा, इआ कोरोना भागि जई।

 

घरे से देखा तबहिनि निकरा,बहुतै अगर जरूरी हइ,

मुहे म अपने मास्क लगाबा,इआ कोरोना भागि जई।

 

हाँथ जाइ न दिन भर देखा,आंखी मुहे अउ नाके म,

खुद समझा सब क समझाबा,इआ कोरोना भागि जई।

 

केउ मिलै त बाति करा पइ, एक मीटर के दूरी से,

सोशल डिस्टेंसिंग अपनाबा,इआ कोरोना भागि जई।

 

सब्जी भाजी लेइ गयें जे ,घरे के भितरे आबां त,

नहबाबा अउ हाँथ धोबाबा,इआ कोरोना भागि जई।

 

घर परिवार सुरक्षित रक्खा,भीड़ भाड़ से दूरि रहा,

केहू से न हाँथ मिलाबा,इआ कोरोना भागि जई।

 

एहं बीचन म अगर जो देखा,कउनेउ शहर से आये हइ,

शासन कांहीं तुरत बताबा, इआ कोरोना भागि जई।

 

 

 

 

 


ग़ज़ल

 

तबहिनि देखा देश बची

 

 

चउरा बँधइ होइ भुतहइया तबहिनि देखा देश बची।

बेंचा भइंसि बेसाहा गइया तबहिनि देखा देश बची।

 

अमिसा घाम अंजोरी माँहीं निकबर नहीं अंटर्र करा,

सूरुज टांगे उअइ जोन्हैया तबहिनि देखा देश बची।

 

साढ़े साती लिहे शनीचर बइठा ताके डेहरी हइ,

एका खेदा लगइ अढैया तबहिनि देखा देश बची।

 

प्रेतउ हबै रेंदान जउन के पंडा अइसन चाहत हइ,

अंड़रइ खासा मिलइ टोरइया तबहिनि देखा देश बची।

 

पेड़े पेड़े बाज बइठि कइ नोचे लेत हां चिरईनि क,

बचइ खोथइला जीअइ गौरइया तबहिनि देखा देश बची।

 

हाड़ मासु चित्तहरी ताके बइठे मिलैं अघोरी अस,

सोटइ बलभर होइ जितइया तबहिनि देखा देश बची।

 

राति बिराति जो सिगटन साही गली घाट म फेंकरां त,

पाबै काटिनि देइ नटइया तबहिनि देखा देश बची।

 

एनके काने जुआँ न रेंगी ऍह धारा कानूनन से,

संविधान पुनि रचइं रचइआ तबहिनि देखा देश बची।

 

 

 

 

 


ग़ज़ल

 

जाड़ा आमैँ वाला हइ

 

 

हेरे परी गाँउ म पियरा जाड़ा आमैं वाला हइ।

कमरा धूंसा फटा दहिजरा जाड़ा आमैं वाला हइ।

 

टूटि हमां ओरचामनि सगली खटिया हिलगी परी हमां,

पाला सथरी टारि मटियरा जाड़ा आमैँ वाला हइ।

 

धानि मिजाइ त बूसा पाई राति के कउड़ा बारइ क,

सिझइ अंगाकरि नोन दुइ डरा जाड़ा आमैँ वाला हइ।

 

धीरे धीरे गैधूरी म पछुअउ अब पछिआइ लगी,

तापा काकू घाम खलिहरा जाड़ा आमैँ वाला हइ।

 

साटइ केर जुगाड़ कइ लेहे कथरी फाटि रजाई म,

चऊँसी लीन्हें परी डऊँगरा जाड़ा आमैँ वाला हइ।

 

होइ बिहान बड़ा बिलि खोदी लोखरी मरि गई एहीं म,

लरिका तोहरउ हमा अधमरा जाड़ा आमैँ वाला हइ।

 

खादी कूरा ऊपरी कंडा सीजन इया उन्हारी क,

साधा आपन तार सतारा जाड़ा आमैँ वाला हइ।

 

 

 

 

 

 

 

 

 


ग़ज़ल

एका का कहि देई

 

बदरी बइठि दुआरी एका का कहि देई।

लीन्हे हइ अंधियारी एका का कहि देई।

 

इआ जानि कइ चउमस सगला भुकुरे हां,

बोउब कहाँ उन्हारी एका का कहि देई।

 

दुइ बूंदी का गिरी के घोंपा तानि लिहेन,

करेंन हमू हुशियारी एका का कहि देई।

 

राति राति गर्राइ त सोची भुकुरी बरसी,

उठतइ दइउ निहारी एका का कहि देई।

 

बहुतइ त पछिआनि इ चारि महीना से,

निकहिनि रही सियारी एका का कहि देई।

 

पूरूब पच्छिउँ टहरत जब हरबाह दिखिनि,

पूँछा बिआ निकारी एका का कहि देई।

 

फ़इलि बेरामी पइसा पुजा न खादी क,

कइसउ लिहेन उधारी एका का कहि देई।

 

बरसइ नहीं त टरइ इआ अब एसे पूँछी,

"गगनउ" करैं बियारी एका का कहि देई।

 

 

 

 

 

 


गजल

का कहि देई

 

बदरी देखि कइ रोबत लाहां का कहि देई।

सूरुज काहीं धोबत लाहां का कहि देई।

 

जउने काहीं कबउ खुदइ कइ पाबै न,,

ओही काहीं बोबत लाहां का कहि देई।

 

चारि साल से गाइउ ससू बियानि नहीं,

नोई लीन्हे नोबत लाहां का कहि देई।

 

काने माहीं दूध न पाइनि डारइ क,

दोहनी धरे करोबत लाहां का कहि देई।

 

बरदा हइ गरियार तबउ हर नाधे हां,

सेंतिउ अरई गोभत लाहां का कहि देई।

 

लरिका चूल्हा तबा निहारत सोइ गयें,

सेंतीउ माटी पोबत लाहां का कहि देइ।

 

जउनउ पाइनि बेचिनि कटिग ब्याज तरी,

"गगन"मूड़ धई रोबत लाहां का कहि देई।

 

 

 

 

 

 

 


ग़ज़ल

का करी बताबा

 

कइसउ नहीं कटइ त का करी बताबा।

थोरउ नहीं पटइ त का करी बताबा।

 

जरतइ तबा निहारत लरिका त सोइ गें,

भूंखिउ नहीं घटइ त का करी बताबा।

 

मांगे रहा त दीन्हेंन खलरी उचेरि कइ,

तबहूँ नही सटइ त का करी बताबा।

 

जाड़ा रहा त काटेंन पियरा दसाइ कइ,

गद्दा निता अंटइ त का करी बताबा।

 

भूखजरि उधानि ससुरी पेटे सकाइ गइ,

कइसउ नहीं हटइ त का करी बताबा।

 

देउतन क कबौ चउरा म रोट चढ़ा तइ,

लरिका उहइ रटाइ रटइ त का करी बताबा।

 

अंसुअउ पिअइ क पेट भर कबहूँ नहीं मिली,

आँखिअउ नहीं खटइ त का करी बताबा।

 

सरकार बनि ग आपन परिवार छोड़ि कइ,

"गगनउ"क अब जटइ त का करी बताबा।

 

 

 

 

 

 

             


ग़ज़ल

अच्छा लागी का

 

गति बिपत्ति सब अँगने नाचै अच्छा लागी का।

छाती चढ़ि कइ गइरी खांचै अच्छा लागी का।

 

गाँउ गाउँ म रामन घूमा हैराँ नटइ काटइ क।

हंसइ राम पर लंका नाचै अच्छा लागी का।

 

घरे नसानि बहुरिया बपुरी सूरुज देखै काँपै।

कुंती जइसन केऊ फांसै अच्छा लागी का।

 

कलजुग ठाटे बइठा चुप्पे भितरे आँखी गाड़े।

डेहरी बइठा तक्षक खाँसै अच्छा लागी का।

 

कहि देई धृतराष्ट से भीम क चर्चा छोडै।

मूँदा ढांका सगला नासैं अच्छा लागी का।

 

कोने दरी बिछाए शकुनि झूरै फेंकै पांसा।

जउनै मोहरा पाबै गांसै अच्छा लागी का।

 

देउता दानी पोथी पत्रा मंदिर कीन्हें कब्जा।

भूत बइठि कइ गीता बाँचै अच्छा लागी का।

 

 

 

 

 

 

 


गजल

गाँउ म आबा हइ

 

दइ कइ आपन जान गाँउ म आबा हइ।

देश पर होइ क़ुरबान गाँउ म आबा हइ।

 

छाती हबइ गवाह वीर कस लड़ा त देखा,

देह फाटि लोहुआन गाँउ म आबा हइ।

 

टाठी धइ महतारी कहइ उठाबा एका,

जइसइ बहुत भुखान गाँउ म आबा हइ।

 

बैकल साही बाप पछीती परे हाँ चिट्टइ,

ओनकर आंखी कान गाँउ म आबा हइ।

 

मेहदिउ भर त छूट नहीं मेहरारू केरि,

माँगिउ निकद ललान गाँउ म आबा है।

 

चूमा ओकर हांथ बहिनिए बहुतइ रोमा,

राखिउ बांधि पुरान गाँउ म आबा हइ।

 

मूड़े धइ कइ हांथ किनारेन रोमा बपुरु,

भइया हाँ पगलान गाँउ म आबा हइ।

 

दोस्त यार जे सुनिनि त चकरी मारे हाँ,

सब क कइ हैरान गाँउ म आबा हइ।

 

बहि ग लोहू देन्ह परी हइ उज्जर सगली,

गलुआ हबइ झुरान गाँउ म आबा हइ।

 

संदूके म बंद तिरंगा ओढ़ि कइ देखा,

हमरे गाँउ क शान गाँउ म आबा हइ।

 

 

 

 

 

        


ग़ज़ल

माता आमैँ वाली हां

 

भूत प्रेत सब दूरि भगाबै माता आमैँ वाली हां।

दुक्ख बेरामी क निपटाबै माता आमैँ बाली हां।

 

चउरा चाटी देउथानन क होम गरास निहारे हाँ,

मन मंदिरे ज्योति जगाबै माता आमैँ वाली हां।

 

सजे सगल पंडाल विराजे मैहर के महारानी क,

महतारी क धरम निभाबै माता आमैँ वाली हां।

 

कंठी कठुला जबा जराइ नथुनी पहिरे नाके म,

चउरी माँहीं भूत खेलाबै माता आमैँ वाली हां।

 

चूरी तरकी झरका पहिरे ओढ़े चुनरी माथे म,

गोड़े क पैजनि छनकाबै माता आमैँ वाली हां।

 

सेर केर असवारी लीन्हे फरसा खप्पर हांथे म,

चउरा नाचै अउर नचाबै माता आमैँ वाली हां।

 

घिउ के दिया म बाती डारे पंडा बपुरे ताके हां,

देउता दानी सबै जगाबै माता आमैँ वाली हां।

 

चउरा लीपे "गगनउ" मैया तोहरइ राह निहारे हां,

ओनकर विपदा सबै मिटाबै माता आमैँ वाली हां।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

               


ग़ज़ल

हद्द कइ देहे

 

चउमस सगले बोये धानि हद्द कइ देहे।

इआ सउखि काहे चर्रानि हद्द कइ देहे।

 

मंदिर चला बनाये निकहा नीक करे,

मूरति सगली हमां पुरानि हद्द कइ देहे।

 

आपन छोड़ा भाइ क हींसा खाइ लेहे,

अतनी पेटे भूखि उधानि हद्द कइ देहे।

 

मरिग तबहूँ ओकर कौनौ नाउ नहीं,

अपनै गामा करा बखानि हद्द कइ देहे।

 

खलरी नोचे खाइ लेहे पइ अतनेउ म,

ससुरी आगी कहाँ बुझानि हद्द कइ देहे।

 

अइसन विपदा तबहूँ कौनौ फरक नहीं,

दुनहूँ आँखी हमां झुरानि हद्द कइ देहे।

 

ओका कहे हइ नंघा ससू नीचोबइ का,

हेरत हेरत इहइ उखानि हद्द कइ देहे।

 

"गगन" के आड़े कइसौ चला सुनाये पइ,

एकै कविता उहौ पुरानि हद्द कइ देहे।

 

 

 

 

 

 

 

 

 


ग़ज़ल

 

सुनी सारदा माई देखी।

कउनौ काम लहाई देखी।

 

बिना अधेला होईं कइसे,

बिटिया केर सगाई देखी।

 

फटा करेजा झांकी एका,

करे परी तुरूपाई देखीं।

 

ओके घरे जाइ न पाबै,

सूरुज क लुकुबाइ देखी।

 

हवा बैहरा बंद हइ काहे,

आबै खूब जमुहाई देखी।

 

फूटा हबइ घरे क छपरा,

मंहगी बहुत फेराई देखी।

 

हमरे लाने कुछु त सोची,

लरिका ससू जिआई देखी।

 

पेटे किरबा रेंगत लाहां,

रोटी कहउँ देबाई देखी।

 

घरे क पइसा हमहूँ पाई,

लइ दइ चली पटाई देखी।

 

कोल्हू जइसन पेरे डारइ,

बढ़ी इआ महगाई देखी।

 

बिटिया पूजी घरे दुआरे,

ओनका खूब पढ़ाई देखी।

 

अपना काहीं राह देखाइ,

"गगन" केर कविताई देखी।

 

 

 

 


ग़ज़ल

चलि न पाई

 

दारि भात अउ दूनौ बासी चलि न पाई।

दांउ पेंच अउ काटा नासी चलि न पाई।

 

अतने दिना कथउ भर कबहूँ सुने नहीं,

मरत के बेरी मथुरा कासी चलि न पाई।

 

लरिका हइ अंगरेज भखै अंगरेजी देखा,

अउर बहुरिया हिंदी भासी चलि न पाई।

 

कजरी फगुआ अंजुरी देखा सोहति हइ,

राग भैरवी अउर पलासी चलि न पाई।

 

जीगर मेंछा डाढी अउर कोपिंदी भर म,

एनका जो कहबे सन्यासी चलि न पाई।

 

देखा कउनौ  आस  निहारे तोहरे आबा,

तोहरेउ  घरे  परी  अट्ठासी चलि न पाई।

 

जेके आसिरवाद से अतना बड़े भये हइ,

महतारी  जो  मरी पियासी चलि न पाई।

 

सारि    बांधी  गाइ निहारां पानी बपुरी,

कुकुर  दुआरे  खेलां सांसी चलि न पाई।

 

जाति धरम अउ भासा माहीं बांटै सब का,

भले नीति हइ अच्छी खासी चलि न पाई।

 

चूल्हा बंटा त संघे सगला सुक्खउ बंटि ग,

"गगन" के हींसा परी उदासी चलि न पाई।

 

 

 

 

 

 

 


ग़ज़ल

 

हमहूँ क कुछु ज्ञान बताबा।

कउनउ नबा पुरान बताबा।

 

महगाई    आधा  मरि ग,

आधा बचा किसान बताबा।

 

हमरेन गाँउ क  रोटी  लीले,

हमरइ  पेट  लुकान बताबा।

 

जहां क चउकीदारी पाइसि,

ओहीं  घरे  सकान  बताबा।

 

ठंडी  माहीं  लरिकन  काहीं,

कथरिउ नहीं जुहान बताबा।

 

सही गलत क बोलइ बाला।

हमका  केउ  सयान बताबा,

 

परिवारन    हींसा खाइनि,

तबहूँ  हमां  भुखान  बताबा।

 

साठि साल म घरे घुसत हां,

केका  कही  बुढ़ान  बताबा।

 

खटकिरबा के डेरि बस कोउ,

खटिया छोड़ि भगान बताबा।

 

आँखी  आँखी  नाचइ सबके,

अइसन  केउ  महान  बताबा।

 

एह चुनाऊ म छोड़िनि तोहका,

पकड़े  हमां कोलान   बताबा।

 

देखतइ देखत घरे  म अपनेन,

गगन  बने   महिमान  बताबा।

 

 

 

 


ग़ज़ल

बघेली बानी

 

गुरुतुल गुरुतुल बानी लागै।

हर  गरीब  कइ छानी लागै।

 

नात  तेरहंये  लखने आमा,

ओनखर इ महिमानी लागै।

 

पूजा कथा होम क साधइ,

कका केर जजमानी लागै।

 

कंठी कठुला सूता बहुंका,

पट  डारइ  पटरानी  लागै।

 

अंचरे  पुन्नि  प्रताप  समेटे,

इआ सोन अस पानी लागै।

 

दिन म बेला अउर चमेली,

राति  होइ  रतरानी  लागै।

 

ग्रंथन माहीं धरी अमल्लक,

सबसे  इआ  सयानी  लागै।

 

लापा चीपी  इआ    जानै,

सउँहइ सउँह  बयानी  लागै।

 

कजरी  अंजुरी  दादर  टप्पा,

कतनी  इआ   सुहानी  लागै।

 

गाथा  अउर  उखानंन  माहीं,

सब  भासन  कइ नानी लागै।

 

चतुराई     बीरइबल  अस,

पढी लिखी  अउ ज्ञानी लागै।

 

नौरतनन    तानसेन  बनि,

रस अस चुअति रसानी लागै।

 

"गगन" केर मति मथै बघेली,

ओनखे  निता  मथानी  लागै।

 

 


ग़ज़ल

 

कहउ होइ  त हेरी  ओका।

लई घरे एक  फेरी  ओका।

 

देखतइ देखत  मूड़े चढ़ि ग,

धइ कइ टांग उचेरी ओका।

 

जीता देखी काम करै कुछु,

चारि जने मिलि गेरी ओका।

 

कहे रहा तइ भइंसि देइ क,

दिहिसि न देखी छेरी ओका।

 

आपुन  सोटइ  हलुआ पूरी।

परसइ निकद महेरी ओका।

 

चुहुकै आमा पठबइ सगला,

बोकला बिया पतेरी ओका।

 

जेकर पूजिसि गोड़ बोट म,

मारत हइ  अब  रेरी  ओका।

 

ताने महल अंटारी  दइ कइ,

भसकत ठाट  बंड़ेरी ओका।

 

कबहूँ डेहरी गोड़ न काढइ,

सगले  गाँउ क फेरी ओका।

 

बरदा  कस  हइ नाधे तबहूँ,

दिन भर  देइ अंडेरी ओका।

 

अपुनइ चंदा बल भर रेलइ,

बनये  हबइ  पुजेरी  ओका।

 

ठाढि अंजोरी गगन के हींसा,

चउकस राति  घनेरी  ओका।

 

 

 

 

              


ग़ज़ल

 

कैसी खस्ता हालत में हैं।

देखों खड़े अदालत में हैं।

 

पेशा तो मत पूँछो साहब,

पहने कोट वकालत में हैं।

 

खाने वाले सभी मजे में,

मेरा नाम खयानत में है।

 

वैसे तो कुछ बचा नहीं है,

सारा ध्यान अमानत में है।

 

सबसे बड़ी सजा पूँछो तो,

पेशी और जलालत में है।

 

उनकी सारी जीत समझिए,

मुझ पर बरसी लानत में है।

 

मेरी सारी खुशी समझ लो,

उनकी हुई मलालत में है।

 

उल्फत की मत बातें करना,

दिल दिमाग ही सामत में है।

 

दास्तान जब झूठीं तो फिर,

कैसी शरम हजामत में है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


ग़ज़ल

 

अंसुअन क बैपार निहारत बइठे हां।

काकू सजी बजार निहारत बइठे हां।

 

ममता सगल दुलार भरा महतारी क,

आँचर बिका उधार निहारत बइठे हां।

 

काजर बिंदी सेंदुर काहे सस्ता होइग,

दुलही    श्रृंगार  निहारत बइठे हां।

 

परछनि होतै डोली लूटि गइ दुलही क,

पलकी लिहे कहांर निहारत बइठे हां।

 

दरसन दइ भगमानउ ताके पेटी क,

चंदा अउर चकार निहारत बइठे हां।

 

फटही चादर लिहे मौलवी मागत बागैं,

अल्ला सूनि मज़ार निहारत बइठे हां।

 

माँगत माँगत आजु मिली त रोटी पइ,

सूखिनि उहौ अचार निहारत बइठे हाँ।

 

कटिया रहें फसाये ससुरे काटि दिहिनि,

खंभा  लटकत  तार निहारत बइठे हां।

 

टुटहा  ठाट  बंड़ेरी ओदरी भीतिउ सब,

ओनखर सजा दुआर निहारत बइठे हां।

 

"गगन" केर त सगला मोहरा सधे रहें,

कइसन होइ गइ हार निहारत बइठे हां।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


ग़ज़ल

 

जनतौ क कुछु दुक्ख मिटाबा तब न जानी,

पढ़े  लिखे  हन काम  लहाबा तब न जानी।

 

लरिका  चूल्हा  तबा निहारत सोइ गें बपुरे,

अइसइ  आपन  तुहूँ सोबाबा तब न जानी।

 

तोहरे अँगने घिये क मेटिया ढरकति हइ,

तिथि तेउहारे कबउ सुंघाबा तब न जानी।

 

कूलर पंखा बिजली पानी सबै त पाए ह,

हमरेउ अँगने दिया जराबा तब न जानी।

 

बांदर हांथे  पहिलइ  नरियर दीन्हेंन हइ,

अब का होई तुहिनि बताबा तब न जानी।

 

दुइ  तल्ला  से  हमरउ  ठाट निहारे कबहूँ,

खपरउ भर जो कबउ छबाबा तब न जानी।

 

अतना रोएंन फूटि गइ आँखी सगली देखा,

अपनौ आँखी कबउ बहाबा तब न जानी।

 

दूध दहिउ अउ साढ़ी निकहा सोटा पइ,

माठउ  हमरे  लाने लाबा  तब न जानी।

 

दस चकरन    पानी  डारि कइ बइठे ह,

काहे  इआ  चला समझाबा तब न जानी।

 

बोये जबा  निहारत  हमका परिखे कब से,

आपन देउता तुहिनि खेलाबा तब न जानी।

 

सूपा  छोड़ि  चलानिया  तोहरौ खास हिबै,

ओखा  ओकर  छेंद  गिनाबा तब न जानी।

 

"गगन" त देखा जउन उरेहां कागज म,

बड़े  गवइया  ओका  गाबा तब न जानी।


गीत

 

खेती केर बखान करी पइ कहां बखानी हो।

लरिका हमरउ करइ न चाहां आजु किसानी हो।

 

चारा चतरी सबै जरे हॉं।

नहबाबा अस खेत परे हाँ।

सालन से हॉ बाह क परिखे।

हर बरदा हरबाह क परिखे।

 

मरित हबै दिन राति अकेले दूनौ परानी हो।

लरिका हमरउ करइ न चाहां आजु किसानी हो।

 

लगा असाढ़ डंउगरा डारे।

जोरई  लीन्हे हमन निहारे।

चउहीं नगरा टूट हाँ सगले।

मेडि डरारि फ़ूट हॉ सगले।

 

रोपा छोड़ी झुरिअउ अब तक नहीं बोबानी हो।

लरिका हमरउ करइ न चाहां आजु किसानी हो।

 

अरहरि उरदा रहा त सरि ग।

तिली म सगले पानी भरि ग।

कोलिया बिना रुँधानि परी हइ।

बिरबाही मुरझानि परी हइ।

 

भंईसिउ पाड़ी छूँछि परी हां कहां बियानी हो।

लरिका हमरउ करइ न चाहां आजु किसानी हो।

 

झनगा बिना निराये झरि गें।

चउमस रहें त सगला परि गें।

बोयेंन कइउ हराई जरि गा।

रहिला मसुरी राई जरि गा।

 

झूरा परि गा बिना पलेबा मिला न पानी हो।

लरिका हमरउ करइ न चाहां आजु किसानी हो।

 

अतनी कलपडाह हइ आसउँ।

बिटिया केर बिआह हइ आसउँ।

ओकर होइ बिदाई कसि कइ।

झउअन कर्ज पटाई कसि कइ।

 

ओरिअन आँसु चुअइ दुख ढरकइ कहइ कहानी हो।

लरिका हमरउ करइ न चाहां आजु किसानी हो।

 

बिकि ग खेत बगार गहन हइ।

फ़रिका अउर दुआर गहन हइ।

खादी बीज बिसार क करजा।

कसि कइ पटइ कुमार क करजा।

 

परे दुआरे "गगन"  निहारां छपरा छानी हो।

लरिका हमरउ करइ न चाहां आजु किसानी हो।

 


गीत

 

सोचत सोचत राति कटी बिहान होइ ग हो।

लरिका लरिका नही रहा सयान होइ ग हो।

 

बड़े सकन्ने से संझा तक,

भितरे बहिरे धबाइ।

मेर मेर क बाति करइ,

अउ सगला दिन दऊड़ाबइ।

 

खेलइ खेल खिलौना मागै,

मेर मेर क सगला।

कबहूँ चुन्दइ पकड़इ कबहूँ,

काने डारै दगला।

 

अब तउ ओकर सगला कहा विधान होइ ग हो।

लरिका लरिका नही रहा सयान होइ ग हो।

 

महतारी क चूमइ चाटइ,

दिन भर करइ लङाई।

केउ कहइ कुछु डंडा लीन्हे,

पहुंचइ सीधे दाई।

 

आमिल गुरुतुल जउनइ पाबै,

दिन भर आमा चाटइ।

नाती खातिर दाई बपुरी,

चीखि चीखि कइ बांटइ।

 

अइसन बीता समय ससू उखान होइ ग हो।

लरिका लरिका नही रहा सयान होइ ग हो।

 

फोटो देखइ दिन भर पूंछइ,

कहाँ चलेंगे बाबा।

हमसे दिन भर कहै के ओनकर,

किस्सा चला सुनाबा।

 

सगला दिन हुङदंग मचाबइ,

करइ खूब शैतानी।

दिन भर कनिया लादे घूमा,

नना ममा अउ नानी।

 

फुफुअन केर खिलउना सब ऐरॉन होइ ग हो।

लरिका लरिका नही रहा सयान होइ ग हो।


 

बहिनि भाइ सब बहुतै माना,

घरे म सबसे छोट रहै।

कउनउ होइ मुकदमा एनकर,

ओके पक्ष म बोट रहै।

 

अरजइ ताऊ बड़ी दिदी से,

हमरे संघे आबा तूँ।

कुकूर पिलई बोकरी बछिया,

हमका चला देआबा तूँ।

 

देखतइ देखत किस्सा सगल पुरान होइ ग हो।

लरिका लरिका नही रहा सयान होइ ग हो।

 

टाठी लाबइ रोटी परसइ,

रक्खइ प्रेम बियारी से।

सगली राति खेलाबइ सोबै,

बस अपने महतारी से।

 

समय बीति ग बड़ा होइ चला,

समझइ न समझावत हइ।

नई रीति अउ चाल चलन सब,

विधिवत बइठि बताबत हइ।

 

करतइ करत नदानी कब इंसान होइ ग हो।

लरिका लरिका नही रहा सयान होइ ग हो।

 

दिनभर फोटो देखइ चूमइ,

दरवाजा क झाँकति हइ।

निकरा नहीं के कौखन जल्दी,

आबै डेहरी ताक़ति हइ।

 

पढा लिखा हुशियार हइ देखइ,

अपने धंधा पानी क।

बनइ सहारा ध्यान म रक्खइ,

हमका दूनौ परानी क।

 

जब से करिसि नौकरी त महिमान होइ ग हो।

लरिका लरिका नही रहा सयान होइ ग हो।

 

मांगी तोंहसे भोले शंकर,

सब सुंदर अउ ठीक रहइ।

कहौं रहइ सब खुसी मिलइ,

अउ जिउ जामा से नीक रहइ।


 

नेम प्रेम से सबसे बोलइ,

सबहिनि क सम्मान करइ।

देश निता जो परइ जरूरति,

खुद काहीं कुर्बान करइ।

 

मंदिर पूजा मस्जिद निता अजान होइ ग हो।

लरिका लरिका नही रहा सयान होइ ग हो।

 


कुछु मुक्तक

 

(1)

 

फटहा कबउ न सिलइ, ई नीक आइ का।

खाइउ भरे क न मिलइ, ई नीक आइ का।

ताड़े हमा के बड़कबा चिनगा हमार आइ,

कंदए म गोड़ न हिलइ, ई नीक आइ का।

 

(2)

 

जेहिक देखा गाइ रहा है का करबे।

सगला देश बेचाइ रहा है का करबे।

अउचटि हइ अँधेरि फलाने संचि रहा,

खाइ जहां जे खाइ रहा है का करबे।

 

(3)

 

आपन साही जिअत हां छोड़ा मरइ जाइ दे।

फाट करेजा सियत हां छोड़ा मरइ जाइ दे।

मारिसि केउ के अपुनइ मरिग के जानइ

काहे अतना  पिअत हां छोड़ा मरइ जाइ दे।

 

(4)

 

सरकार गढ़ै लरिका आँखी न फूटि जाइ।

फोनइ म पढ़ै लरिका आँखी न फूटि जाइ।

भितरे त कहउ कइसउ नेटवर्क न मिलइ,

पेड़े म चढ़ै लरिका आँखी न फूटि जाइ।

 

(5)

 

झारा निकद मलीदा इआ सोचि लेहे तूँ।

कउरउ मिली खरीदा इआ सोचि लेहे तूँ।

मानित हबइ हमार त सगलइ चला जइ,

आपन बचइ त छीन्दा इआ सोचि लेहे तूँ।

 

(6)

 

केउ न सुनिहीं कइसउ काहीं कहउँ जाइ कइ रोउबे।

घरिया भुगतत लोकतंत्र क आखिर कतना ढोऊबे।

कथरी लुगरी पुजइ न आपुन सोमा तानि रजाई,

ई मारिहीं गुलछर्रा पइ तूँ जरतइ पेटे सोउबे।

 

 

(7)

 

आसउँ त अट्ठासी परि गइ सगले डीहे काएँ।

बोट त दीन्हे गति विपत्ती म कहंउ केउ का आएं।

जइसइ सुनिनि चुनाऊ त फूटें  पहरी उज्जर पिउरी,

चारि जने मेड़रातइ रहिहीं तोहरे बाएं दाएं।

 

(8)

 

कहे रहेंन त मानिसि का मरइ जाइ दे।

हमका तोहका जानिसि का मरइ जाइ दे।

हमरेउ अउचट दुक्ख परा तइ पिये रहा,

ओके परा त छानिसि का मरइ जाइ दे।

 

(9)

 

जरतइ अंगरा जब देखइ त खोंसे हाँ उपड़उरे म।

जउनइ मिलइ त हांके हाँ इ सगले गांउ मेंड़उरे म।

दुइ डाँड़ी हां पढ़े फलाने फेरउ आकिलि अजीरन हइ,

बीछी काहीं मंत्र न जाना घुसुरे जाइं बेमउरे म।

 

(10)

 

चूँ चाट उ करिनी चियाँ बनाइ चलेंगे।

साधू रहेंन त हमका मियां बनाइ चलेंगे।

गचरउ पचर म लदर फदर ओइ करिनि तइ,

अंगा रहेंन त हमका इयाँ बनाइ चलेंगे।

 

(11)

 

महुआ चुरा कुकर म धुकना हेराइ ग।

कजरी हेराइ गइ अउ झुकना हेराइ ग।

मेला म कबौ अम्मा के लाने जऊन लिहेन,

चिमटा हेराइ ग उ फुकना हेराइ ग।

 

(12)

 

दउरी हेराइ गइ अउ गरदा हेराइ ग।

एक ठे रहा आसौं उ बरदा हेराइ ग।

नगरा त ससू फार अउ चौहीं क तरसि गें,

नोई, गुढ़ा, गेराइं अउ छांदा हेराइ ग।

 

 

 

 

 

(13)

 

आंखिनि से बही आंसु के छलकी तरसि गएन।

घुंघुट म कब से दुलही के झलकी तरसि गएन।

गारी मिलइ न अब बसी बराति सुनइ  ,

कांधे लिहे कहार क पलकी तरसि गएन।

 

(14)

 

कच्चा पका के साथ पकऊंधा कहाँ मिलइ।

दोहनी कहाँ मिलइ उ अऊंधा कहाँ मिलइ।

दारि भात बासी कउड़ा म सेंकि कई,

अम्मा के हांथ केर गुलऊंदा कहाँ मिलइ।

 

(15)

 

जतबा क बाति का करी चाकी नहीं रही।

काँड़ी त घरे परी हबइ टाँकी नहीं रही।

चाचा त हमा गाँउ म चाची बहुति हमा,

किस्सा सुनाई देइ उ काकी नहीं रही।

 

(16)

 

कुरई क कही कसि कई पइला नहीं बचें।

सड़किनि सड़कि के आगे गइला नहीं बचें।

एक ठे जुआं बची हइ दूसर हेराइ गइ,

पैना क नाउ जाइ दे सइला नहीं बचें।

 

(17)

 

पउआ भर दुक्ख किलोवन सैराइ ग।

बोरा भर नेम प्रेम झोरा म आइ ग।

गगरी भर आँसु लेहे डेहरी म बइठेन त।

धोखे से लात लगा संचइ अंड़ाइ ग।

 

(18)

 

खलरी सकिली लोहू सुलगा आसउँ के अट्ठासी म।

देहें केर पसीना सिझयेन हमहूँ जरत लुआठी म।

सगली राति अंजोरी ताके बइठेन के जेउनारि मिली,

अंगरा जइसन घाम धरा हइ सउहँइ हमरे टाठी म।

 

 

 

 

 

(20)

 

तोहरे आबत जात हबइ पइ का करबे।

अंइचड़ हइ ऎंड़ात हबै पइ का करबे।

मानेंन हमां डेरान पइ सगले बंधे हमां,

तोहंउ क चिल्लात हबै पइ का करबे।

 

(21)

 

आपन आपा खोबा न संचि रहा।

दुक्ख परा हइ रोबा न संचि रहा।

झूर हबै चोपिआनै मांही सूखि जइ

सूती लिहे करोबा न संचि रहा।

 

(22)

 

पढी हबै कजरउटा कहबे का जानइ।

नोइ अउर सिंघउटा कहबे का जानइ।

पोंछा लीन्हे खड़ी हइ बपुरी डेहरी पर,

तूँ पोतई डेहरउटा कहबे का जानइ।

 

(23)

 

केसे पूँछी कहाँ चली गइ सगली हंसी दुआरी केर।

सून खोथइला लटकत लाहै काहे हमरे बारी केर।

आखिर लूटिसि मारि दिहिसि के हमरे सोनचिरैया क,

दरकत हबै करेजा देखि कइ दुक्ख बइरि के डारी केर।

 

(24)

 

देश रहा त बंटि ग सगला राम रहीम अउ ईशा म।

बिल्लियांन हां हमरउ लरिका अपनेन पोबा पीसा म।

अँसुअउ रहा त बाँटिनि जबसे अखिअउ ससू झुराइ गईं,

झूरइ पेट निहारी असि ओसि हम हन केके हींसा म।

 

(25)

 

मंदिर बना मनौता कीन्हिनि रोइ रहे हां।

सगले गाउँ म नेउता कीन्हिनि रोइ रहे हां।

गण नर किन्नर बीछी गोजर भूत जुहाने,

देउतन से समझउता कीन्हिनि रोइ रहे हां।

 

 

 


 

(26)

 

पूँछीनि कइसन हबा बताई का कहि देई।

माँगइ गोहूँ जबा बताई का कहि देई।

छानी से जनगाथी खींचिनि रेंगि दिहिनि,

हम बंउड़ाइ गबा बताई का कहि देई।

 

(27)

 

लरिकन से निपटारा कइ ले मरे न कहिअउ।

लड़ा न तूँ बटवारा कइ ले मरे न कहिअउ।

रुपिया पइसा जिये से बढ़ि कइ थोरउ हइ,

थोरेंन बहुत गुजारा कइ ले मरे न कहिअउ।

 

 

 

 

 

 

 

 

 


कुछु मुक्तक

चारि चारि डाँड़ी

 

पढी हबै कजरउटा कहबे का जानइ।

नोइ अउर सिंघउटा कहबे का जानइ।

पोंछा लीन्हे खड़ी हइ बपुरी डेहरी पर,

तूँ पोतई डेहरउटा कहबे का जानइ।

 

दूध के खातिर जामन हेरइ पठएन तइ।

रोटी सिझइ केरामन हेरइ पठएन तइ।

भितरे गइ त फटी पिछउरी लइ आई,

खाटे क ओरचामन हेरइ पठएन तइ।

 

धरी अमल्लक गोड़िया हेरे नहीं मिली।

मचिया छोड़ी मोढिया हेरे नहीं मिली।

धरे कपारे हाँथ बिचारी बइठी सोचै,

माठा खातिर छोढिया हेरे नहीं मिली।

 

माटी जानइ भुइआँ बपुरी का जानइ।

ओकर के हां गुइआँ बपुरी का जानइ।

डेहरी ताके घूंघुट काढ़ि निहारति हइ,

टाठी अउर रोसइंया बपुरी का जानइ।

 

जरी इआ के फुटकी बपुरी का जानइ।

मेझरी कोदौ कुटकी बपुरी का जानइ।

भाजी कसिकै खुटकै केउ बतौबे का।

चूल्हा पइना पुटकी बपुरी का जानइ।

 

हांके खाइ न छेरी चुप्पे खड़ी हबै।

कहिया टूटि बंड़ेरी चुप्पे खड़ी हबै।

सासु निहारे धुआं दुआरे बइठी हइ।

चुरबै कहिसि महेरी चुप्पे खड़ी हबै।

 

 

 

 

 

                                                            


कुछु मुक्तक

चारि चारि डाँड़ी

 

केसे पूँछी कहाँ चली गइ सगली हंसी दुआरी केर।

सून खोथइला लटकत लाहै काहे हमरे बारी केर।

लूटिसि मारि दिहिसि के देखा हमरे सोनचिरैया क,

दरकै ससू करेजा देखै दुक्ख बइरि के डारी केर।

 

देश रहा त बंटि ग सगला राम रहीम अउ ईशा म।

बिल्लिआइ गें लरिका देखी अपनै पोबा पीसा म।

अँसुऔ देखा बाँटिनि जबसे आँखी झुराइ गईं,

झूरै पेट थथोली सोची हम हन केके हींसा म।

 

झारा निकद मलीदा इआ सोचि लेहे तूँ।

कउरउ मिली खरीदा इआ सोचि लेहे तूँ।

मानित हबइ हमार त सगलइ चला जइ,

आपन बचइ त छीन्दा इआ सोचि लेहे तूँ।

 

केउ न सुनिहीं कइसौ काहीं कहौं जाइ कइ रोउबे।

घरिया भुगतत लोकतंत्र क औरौ कतना ढोऊबे।

कथरी लुगरी पुजइ न आपुन सोमा तानि रजाई,

ई मारिहीं गुलछर्रा पइ तूँ जरतइ पेटे सोउबे।

 

जरतइ अंगरा जब देखइ त खोंसे हाँ उपड़उरे म।

जउनइ मिलइ त हांके हाँ इ सगले गांउ मेंड़उरे म।

दुइ डाँड़ी हां पढ़े फलाने फेरौ ससू अजीरन हइ,

बीछी काहीं मंत्र न जाना घुसुरे जाइं बेमउरे म।

 

आंखिनि से बही आंसु के छलकी तरसि गएन।

घुंघुट म कब से दुलही के झलकी तरसि गएन।

गारी मिलइ न अब बसी बराति सुनइ  ,

कांधे लिहे कहार क पलकी तरसि गएन।

 

तोहरे आबत जात हबइ पइ का करबे।

अंइचड़ हइ ऎंड़ात हबै पइ का करबे।

मानेंन हमां डेरान पइ सगले बंधे हमां,

तोहंउ क चिल्लात हबै पइ का करबे।

 

सालन लीन्हे भूतउ खासा गचके हां।

देउता पाइनि गद्दी फूले पचके हाँ।

कांधे माँ बैताल के नाइ झूलि गये,

दूनौ मिलि जजमानं काहीं हचके हां।

 

 

 

 

घर माहीं मंदिर बनवायेन अउ बइठायेन देउता।

होम गरास खुरहरी सगले गाउँ म कीन्हेंन नेउता।

गण नर किन्नर बीछी गोजर सगला भूत जुहाने,

केउ न जानिसि होइ ग चुप्पे दूनौ क समझउता।

 

लरिकन से निपटारा कइ ले मरे न कहिअउ।

लड़ा न तूँ बटवारा कइ ले मरे न कहिअउ।

रुपिया पइसा जिये से बढ़ि कइ थोरउ हइ,

थोरेंन बहुत गुजारा कइ ले मरे न कहिअउ।

 

पूँछीनि कइसन हबा बताई का कहि देई।

माँगइ गोहूँ जबा बताई का कहि देई।

छानी से जनगाथी खींचिनि रेंगि दिहिनि,

हम बंउड़ाइ गबा बताई का कहि देई।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


कुछु मुक्तक श्रृंगार लिहे

 

इआ दुक्ख म जियेंन हइ एका कम न माने।

जतना जहर पियेंन हइ एका कम न माने।

कथरी जइसन सूजा गोभि कइ छाती म,

फटा करेजा सियेन हइ एका कम न माने।

 

दिहे अउर लइ लीन्हे मिलब त पूँछब तोहसे।

अइसन काहे कीन्हें मिलब त पूँछब तोहसे।

गलती हमरउ हमसे कबउ बताए हइ का,

दुक्ख जउन तू दीन्हे मिलब त पूँछब तोहसे।

 

उआ पिरीति जियति हइ अबहूँ मरी कहाँ।

सुलगेंन जरेंन बुझानेन तबहूँ जरी कहाँ।

आँखी हइ गरुआनि रोबाई छूटइ अबहूँ,

झरति हबै त  झरइ अबा तक झरी कहां।

 

अइसन अउचट मोहै काहे भेजे तइ।

कसिकइ हमका सोहै काहे भेजे तइ।

सात जनम जब बांधे काहे टोरि देहे,

मिलतइ तुरत बिछोहै काहे भेजे तइ।

 

नाके पहिरि नथुनिया घरे म आई तइ।

कमर बाँधि करधानिया घरे म आई तइ।

गोड़ धरै त छनकै लागइ आंगन सगला,

पाँउ पहिरि पैजनिया घरे म आई तइ।

 

कंठी मोहरि बाली अजुअउ याद हिबै।

होठे कइ होठलाली अजुअउ याद हिबै।

डेहरी जउन निहारति हमका बइठि रहाँ,

दूनौ अखियां काली अजुअउ याद हिबै।

 

मेहदी हमरे नाउ क हांथे धरी रही।

हमरइ राह निहारे बपुरी परी रही।

चूरी बिंदी झुमका हेरे मिला नहीं,

जौनौ पाएंन ऊहौ आधी जरी रही।


 दोहा

बिटिया

 

बिरबा पुछै डारि से, केकर लगि गइ हाय।

घुसी खोथइला सन्न हइ, निकरै माहिं डेराइ।

 

नोचिनि सगले देह क, फूँकीनि धय धय बाँधि।

अतनेउ माहीं मिटी न, ओनखे मन के साधि।

 

फटहा ओन्ना डारि कइ, टहरिसि सगले गाँउ।

डेहरी डेहरी गइ तबउ, मिली कहंउ न ढाउँ।

 

बड़े भागि जन्मइ घरे, खेलइ करइ विभोर।

बिना सूरुज अउ चंद्रमा, अँगने करइ अंजोर।

 

अंचरे ममता बहि रही, छाती अमृत  वास।

ओके हंसेंन म आस है, रोये सृष्टि विनाश।

 

लरिका जनमी जब कबउ, बिटिया बनी पतोह।

नहीं त कइसउ बंस क, कहंउ न पउबे टोह।

 

ठाढि जोन्हैया लाजि क, बदरी बीच लुकाइ।

ओढ़ि अंजोरी घाम अस, कसि कइ अँगने जाइ।

 

आँखी ढरकति आँसु लइ, सबसे करै सवाल।

हमरइ आँचर हइ बना, हमरेंन जिउ क काल।

 

रोकी कोखेंन न मरइ, भुइयां रक्खइ पाँउ।

बिटिया अँगने जो हंसी, महकी सगला गाँउ।

 

बिटिया गीता बाइबिल, बिटिअइ आइ कुरान।

बिटिया सृष्टि अधार बनि, करी जगत कल्यान।

 


 

 

        कविता.

मूर पाइ जाब त कहब

 

कक्षा मा मास्टर साहब,

आसउ के साल

बोलिनि एक ठे सवाल-

कहिनि लरिकउ आपन आपन,

दिमाग़ दउड़ाबा

चला एँह प्रश्न क उत्तर बताबा

मानिले रमुआ के बाप क,

सउ रूपिया हम दीन्हेंन,

करबाबइ क दवाई

त आठ रूपिया सैकड़ा के दर से,

उ साल भरे मा,

हमका कतना लउटाई?

सवाल सुनतइ तउआइ कइ,

भ रमुआ खड़ा

मास्टर साहब कुछू नहीं,

झट्टइ बोलि पड़ा

मास्टर साहब सन्न रहिगें,

लाल होइगें

कुर्सी पा गिरें निढाल होइगें

कहिनि- अरे मूरख,

साल भर तइ एहीं कक्षा क,

सीढ़ी उतरे चढ़े हइ

फेरउ अतने दिन मा,

तइ इहइ पढ़े हइ

अरे गदहा हम जउन कहिथे,

नोट कइ लेहे

एँह पढ़ाई के माथे 

पास होइ जये त कहे

इ सुनि कइ रमुआ बोला-

मास्टर साहब,

हमार उत्तर ग़लत हइ,

इ हम मानेन

पइ अपना हमरे बाप क,

बिल्कुल नहीं जानेंन

देखि लेब, अपनउ एँही हमन,

हमहूँ एँही रहब

ब्याज त ब्याज,

मूर पाइ जाब त कहब

 

 

 

        कविता

एक ठे सवाल.

 

मास्टर साहब कक्षा मा,

गणित पढ़ाईनि।

सगला सवाल बोर्ड मा,

जोड़ि घटाइ कइ,

समझाईंनि।

फेर कहिनि के,

अच्छा लरिकउ,

सही-सही बताबा।

जउन हम पढ़ाएँन,

का समझ मा आबा।

कुछु समझिनि त,

दोहराई दीहिनि।

जउन नहीं समझिनि,

त सेंतीउ मूड हलाई दीहिनि।

ईया प्रगति देखि कइ,

मास्टर साहब क करेजा,

खुशी से पुलुकि उठा।

मन सवाल पूछइ क,

कुलुक़ि उठा।

कहिनि-कलुआ तइ इहन आउ।

एक ठे प्रश्न पूछी थे बताउ।

मानि ले तोर ठाकुर,

चारि ठे मनई साटत हँ।

उ चारिउ मिलि कइ,

ओन्कर खेत चारि दिन म,

काटत हाँ।

त जो उ दूइ ठे मनई सटिहीं।

त उ दूनउ मिलिकै,

उहइ खेत कइ दिन मा कटिहीं?

सवाल सुनतइ,

रमुआ क मन डोलि उठा।

उ खट्टइ बोलि उठा।

मास्टर साहब अपना हमका,

दंत निपोर न बनाई।

ग़लत-सलत सवाल,

हमसे न लगवाई।

ज़्यादा हुशियारी न छाटी।

अरे जउन खेत पहिलेंन कटा हइ,

ओका केउ काहे काटी।

 

 

        कविता.

पढ़ाई अउ ध्यान.

 

कक्षा म मास्टर साहब गरजें,

का रे रामुआ,

तइ जउन कठउता भर,

खाइ कइ परे हसु।

का जउन हम सबक दिहे रहेन,

ओका करे हसु।

डेरातइ-डेरात रमुआ,

मास्टर क निहारिसि एक नज़र,

अउ धीरे से कहिसि-यस सर।

मास्टर साहब खुस होइ कइ कहिनि-

अच्छा त इहन आउ।

बीरबल के आही? हमका बताउ।

रमुआ सवाल सुनिसि।

कुछु मनइ-मन गुनिसि।

कहिसि-सर जब पढ़ेन तइ,

तब लाग के चढ़ि ग।

पइ अपना के पुछतइ,

एकदम दिमाग़ से उतरि ग।

मास्टर साहब ताउ म आईगें।

कहिनि-गदहा जिंदगी म,

किताब देखु,

तब न अक्षर पहिचानु।

पढ़ाई म थोरउ क ध्यान दे,

तब न एनका जानु।

ईया सुनिकइ रमुआ बोला-

सर हम गदहा हन,

ई मानित हइ।

पइ का अपनइ,

रमेश औ महेश क जानित हइ?

मास्टर साहब बोलें-

हम मारब झापड़,

हमका किहनी न बुझाउ।

ई ससू के आहीं,

तहिनि बताउ?

रमुआ कुलुकि कइ कहिसि-

दिखेन न धइ गइ सगली चौहानी।

अरे अपने बिटिया पर,

थोरउ क ध्यान देई,

त एनका जानी।

 

 

 

 

        कविता.

कलुआ अउर महट्टर.

 

मास्टर साहब कलुआ क,

अपने लगे बलाइनि।

ज़ोर से हड़काइनि।

कहिनि-ससू तइ त,

हमका हैरान करे हसु।

अब का कही के कतना,

परेशान करे हसु।

तइ हमार करेजा काहे,

चाबत थे।

सगला लरिका,

एकट्ठइ टाइम से आबत हाँ,

तइ रोज लेट काहे आबत थे?

इया सुनि कइ कलुआ क,

चंचल मन डोला।

उआ मास्टर साहब से बोला-

इ ससू सुअरिनि क झुँडि आहीं,

साथइ अइहीं,

इआ हमार दावा हइ।

पइ हम त शेर आहेन,

जउन का कबउ झुँडि म आबा हइ।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

                     

 

 

 

 

 

 

        कविता.

          मुरगी.

 

मास्टर साहब,

कक्षा म नज़र दउड़ाइनि।

पीछे के कुर्सी म,

रमुआ क रोबत पाइनि।

कहिनि-ससू सगला दिन,

कक्षा म सोबत हसु।

अब का होइ ग?

काहे रोबत हसु?

रमुआ कहिसि-मास्टर साहब,

इआ गणित वाली मैडम,

आजु आपन घरे क गुस्सा,

हमरेन उपर उतारिसि हइ।

हम ओका मुरगी कहि दिहेन त,

बलभर मारिसि हइ।

मास्टर साहब कहिनि-

ससू तइ दतनिपोर क,

दतनिपोरइ रहे।

अरे मैडम क मुरगी काहे कहे?

रमुआ कहिसि-मास्टर साहब,

हमहूँ पढ़े हमन,

आख़िर कउनउ सवाल पर,

कब तक चुप्प रहब?

जउन रोज हमका,

कापी म अंडा देई,

ओका मुरगिनि न कहब।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

        कविता.

रमुआ अउ मुहावरा.

 

मास्टर साहब कहिनि-

रमुआ तइ इहन आउ।

एक ठे मुहावरा,

आधा हम बोलित हइ,

खाली स्थान तइ बताउ।

रमुआ कहिसि-सर,

जतना अपना समझित हइ,

हम अतना दतनिपोर,

नही आहेन।

गणित म मानित हइ,

पइ हिन्दी म,

अतना कमजोर नही आहेन।

जब देखइ तब बूँकित हइ।

पूछी का पूछित हइ?

मास्टर साहब कहिनि-

जो न बना त हम,

टोरि देब तोहार नली।

अच्छा खाली स्थान भरु.

९०० चूहा खाइ कइ,

बिल्ली.........चली।

रमुआ कहिसी-सर,

अतना हमहूँ पढ़े हमन,

अब अपना केरि दारि न गली।

900चूहा खाइ कइ,

बिल्ली"धीरे-धीरे" चली।

मास्टर साहब गुस्साइ कइ कहिनि-

नलायक अब हम तोका,

देतइ हन ठाहर।

नहीं त निकलिनि जये,

कक्षा के बाहर।

इ सुनि कइ रमुआ कहिसि-सर,

जानत त हम रहेन हइ।

पइ इया उत्तर हम अपना केर,

मन रक्खइ खातिर कहेन हई,

नही त अपनइ बताई।

९०० चूहा खाइ कइ,

बिल्ली त बिल्ली ओकर,

बापउ न चलि पाई।