गगन
शुक्रवार, 29 मई 2015
सोच
मेरी ही खामोशी जिससे मिट सा गया वजूद मेरा.
सोच रहा हूँ जीने का अंदाज बदल कर देखूं क्या ?
चलो गाँव की ओर
अंधियारी रातों से डर कर, छम से कोई सपना टूटे.
शहरों की इस चका-चौंध में,कल को कोई अपना छूटे.
कही अमावस निगल न जाए,कोई शाम सुहानी फिर से.
रोक न ले बढ़ते कदमों को,अपनी इक नादानी फिर से.
स्वागत को आतुर है सूरज,लिए शबनमी भोर चलो.
चलो गाँव की ओर चलो,चलो गाँव की ओर चलो.
"गगन"
गुरुवार, 18 सितंबर 2014
कुर्सी
रोजी-रोटी घर की चिंता खबरें आने-जाने की.
यह कुर्सी ही राजदार है मेरे हर अफ़साने की.
कोशिश
मुक्त कर दिया सूरज को, कल उसको भी घर जाना है.
अगली कोशिश आसमान से, चाँद उठा कर लाना है.
"गगन"
मुझे तुम याद कर लेना.
न हो मेले में जब मस्ती, मुझे तुम याद कर लेना.
बिखरने जब लगे हस्ती, मुझे तुम याद कर लेना.
तुम्हारा शौक इस दरिया के अक्सर पार जाना है.
भंवर जब रोक ले कश्ती, मुझे तुम याद कर लेना.
“गगन”
हासिल.
ज़रा नादान था ये दिल, मगर समझा लिया हमने.
हुआ कुछ भी नहीं हासिल मगर सब पा लिया हमने.
लिखी थी नज्म, जो हमने, कभी तेरी जुदाई में.
जो तेरी याद आयी तो, उसे ही गा लिया हमने.
“
गगन
”
गुरुवार, 10 अप्रैल 2014
बचपन.
एक पोटली मुझे थमा कर उस बचपन के किस्से की.
जो भी चहिये सब ले जाना खुशी हमारे हिस्से की.
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